मूल्यों के अभिज्ञान का सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार सूक्ष्म दृष्टि तथा सूझ-बूझ की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि जब किसी व्यक्ति में दोनों प्रकार की परिस्थितियों की प्रक्रिया, उद्देश्य, एक विषय-वस्तु का सम्यक ज्ञान सामान्य रूप से सहज हो जायेगा तभी एक परिस्थिति का ज्ञान दूसरी परिस्थिति में स्थानान्तरित हो सकेगा। अत: इस सिद्धांत की उपलब्धि हेतु उच्च क्रोटि की बौद्धिक क्षमता के सक्रिय प्रक्रिया की आवशयकता पड़ती है। इस प्रकार से बुद्धि की उच्च मात्रा तथा समायोजनशीलता का उत्कृष्ट गुण ही मिलने पर किसी विषय के ज्ञान को सहज बनाने में सहायक होते है और यही सहजता ही समयिकरण है।
क्रो एव क्रो ने अपना मत इस प्रकार से प्रगट किया है- विशिष्ट निपुणता या विशेष आदत या मनोवृति का प्राप्य दूसरी स्थिति में स्थानान्तरण से बहुत महत्त्व रखता है। यह स्थिति उस समय तक चलती है जब तक निपुणता, तथ्य, स्वभाव क्रम बद्ध नहीं हो जाते।
आलोचना- यह तो सही है कि जब दो बातों में समानता होती है तो दूसरी बात भी आसानी से "समझ में आ जाती है लेकिन यदि समान तत्व सिद्धान्त में समानता का अर्थ वस्तु या समान तत्वों से लगाया जाता है तो यह सिद्धान्त भी ठीक जैसा ही है जैसा समान तत्व सिद्धान्त दोनों में कोई विशेष अन्तर नहीं होता।
प्रयोग की दृष्टि से एच. जेड ने छात्रों का एक समूह लिया तथा इसे दो भागों में बाँट लिया। हर समूह को उसने एक फुट गहरे पानी में रखी वस्तु पर निशाना लगाने का प्रशिक्षण दिया तया दूसरे समूह को कोई प्रशिक्षण नहीं दिया। अब दोनों समूहों के छात्रों को गहरे पानी में रखी वस्तु पर निशाना लगाने के लिए कहा गया। दोनों समूहों के छात्र निशाना लगाने में असफल रहे। प्रयोग के दूसरे चरण में वस्तु पानी में और गहरी रख दी गयी। इस बार प्रयोगात्मक समूह के छात्रों ने निशाना लगाने में अधिक सफलता प्राप्त की। एच. जेड. ने इसका कारण प्रयोगात्मक समूह के छात्रों को अशिक्षित होना बताया। इस सिद्धान्त के मूल प्रवर्तक कोहलर क्रोस्का व वदमिर है। इनके अनुसार अधिगम का स्थानान्तरण न तो केवल सनयवस्था से सम्भव है और न केवल समान तत्वों के ज्ञान से बल्कि जब तक दो परिस्थितियों का सम्पूर्ण रूप से एक समुच्चय ज्ञान की उपलब्धि सहज भाव में होकर व्यक्ति के व्यक्तित्व का अंग नहीं बन जायेगी तब तक एक क्षेत्र का ज्ञान दूसरे क्षेत्र के ज्ञान में स्यानान्तरित नहीं हो सकेगा। अत: स्थानान्तरण की मात्रा दो क्षेत्रों के ज्ञान में विद्यमान समानता की खोज की सफलता पर निर्भर करती है।
 मनोवैज्ञानिकों ने वैज्ञानिको के इस विचार को समान तत्वों के आधार पर विकसित हुआ सिद्धान्त माना है। यह सिद्धान्त थार्नडाइक द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्त की अपेक्षा अधिक संकीर्ण तथा सीमित है।
मूल्यों के अभिज्ञान का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के प्रतिपादक वागले है। उनके अनुसार अन्तरण का सम्बन्ध वस्तुओं या क्रियाओं से नहीं होता जितना कि उन क्रियाओं को अन्तरित करने वाले व्यक्ति के आदशों होता है। इसलिए व्यक्ति अपने अनुभवों पर आधारित चिन्तन मूल्यों एवं अभिवृत्तिर्यों का अन्तरण करता है जो उसके जीवनशैली व व्यक्तित्व के अंग बन चुके होते हैं। वागले का मत है की सामान्यीकरण ही सम्पूर्ण कथा नहीं अपितु इसका संवहन भावात्मक पहलू के साथ आदर्श के द्वारा होना चाहिए। यदि अन्तरण किया जाना है तो परिबोधन होना ही चाहिए।
आलोचना- यह तो ठीक है कि अन्तरण बहुत कुछ सीखने वाले की इच्छा, रुचि आदि भावात्मक बातों पर निर्भर करता है लेकिन सिद्धान्त की दृष्टि से विचारणीय यह है कि व्यक्ति चाहता है कि वह सीखी हुई बात से दूसरी बात सीखे। फिर यह भी सत्य है कि जब दो बातों में साम्य नहीं होता तो अन्तरण कम हो जाता है। अतः अन्तरण सीखने वाले के आदर्श पर उतना निर्भर नहीं करना जितना वस्तुओं या क्रियाओं की साध्यता पर निर्भर करता है।
अधिगम अंतरण की स्थिति (दशायें)- अधिगम अंतरण के सिद्धात्तों पर चिन्तन करने के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि सीखी हुई क्रिया का अंतरण इन स्थितियों में होता है

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