अधिगम- अंतरण का अर्थ

विटेकर ने अधिगम-अंतरण को इस प्रकार से परिभाषित किया है- प्रशिक्षण के अंतरण से तात्पर्य किसी एक कौशल या विषय वस्तु के सीखने का किसी दूसरे कौशल या विषय वस्तु के सीखने पर पड़ने वाले प्रभाव है होता है।
अधिगम- अंतरण का अर्थ वर्तमान किया पर पूर्व अनुभवों का प्रमाद होता है, अधिगम स्थानान्तरण में एक क्रिया का प्रभाव दूसरी क्रिया पर पड़ता है।
कॉलसनिक्रच्चा अधिगम- अंतरण पहली परिस्थिति से प्राप्त, ज्ञान, कौशल, आदत, अमियोग्यता का दूसरी परिस्थिति में प्रयोग करना है।
गुधरी एवं पखर्स- "अधिगम- अंतरण से अभिप्राय व्यवहार के विस्तार तथा विनियोग से है।
क्रो एवं क्रो -अधिगम के एक क्षेत्र में प्राप्त ज्ञान, अनुभव, विचार, आदत या कौशल का दूसरी परिस्थिति में प्रयोग किया जाता है तो वह अधिगम-स्थानान्तरण कहलाता है।
जिया सोरेन्सन- "स्थानान्तरण एक परिस्थिति में अर्जित ज्ञान, प्रशिक्षण एवं आदतों का दूसरी परिस्थिति में अन्तरण होना है।
पेटासन- यह एक नये क्षेत्र तक विचारों का विस्तार है।
मन- "एक कौशल क्षमता का अधिगम जब दूसरे कौशल क्षमता के अविधगम की उपलब्धि है यह प्रतीत होता है तब हम उसे अभिगम का स्थानान्तरण कहते है। अधिगम के स्थानान्तरण की विभिन्न परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि 'एक अधिगम क्षेत्र का ज्ञान जब दूसरे अधिगम क्षेत्र को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है तो उसे हम अधिगम का स्थानांतरण कहते है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति संस्कृत भाषा का ज्ञान रखता है तो वह प्राकृत भाषा को जल्दी सीख लेता है और उसे प्राकृत भाषा को जल्दी सोख लेने की क्षमता संस्कृत भाषा के ज्ञान के स्थानान्तरण से प्राप्त होती है।
स्थानान्तरण, की प्रक्रिया के बहुत सारे मत है। डॉ. सरयूप्रसाद चौबे ने "मनो-वैज्ञानिक और शिक्षा" नामक अपनी पुस्तक में इस सन्दर्भ में लिखा है- "सिद्धान्त कि एक विषय के अध्ययन से प्राप्त संस्कार इसी विषय तक सीमित नहीं रहते वरन अन्य विषयों तथा परिस्थितियों में उपयोगी सिद्ध होते है, शिक्षा के स्थानान्तरण के नाम से प्रसिद्ध है। इससे स्पष्ट है कि अधिगम की सार्थकता अधिक से अधिक उसमें विधित क्षेत्रों के स्थानान्तरण में निहित है।
अधिगम-अंतरण के प्रकार-
सीखने के स्थानान्तरण है पहले सीखा गया कौशल बाद में सीखे जाने वाले कौशल पर एक प्रभाव डालता है। इस प्रभाव के स्वरूप के परिप्रेक्ष्य में अधिगम अंतरण के तीन स्वरूप स्पष्ट होते है-
  • धनात्मक या सकारात्मक अंतरण- जब पूर्व में सीखे गये कौशल या विषयवस्तु से नवीन कौशल या विषयवस्तु के अधिगम में सहायता प्राप्त होती है तब इसको सकारात्मक अंतरण कहा जाता है या दूसरे शब्दों में पूर्व में प्राप्त ज्ञान नवीन समस्या के समाधान में सहायता प्रस्तुत करता है तो इसको सकारात्मक या धनात्मक अंतरण की संज्ञा दी जाती है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को संस्कृत भाषा सिखने के बाद हिन्दी भाषा को सीखने में उससे मदद मिलती है तो यह धनात्मक या सकारात्मक
  • ऋणात्मक या नकारात्मक अंतरण- पहले सीखे गये कौशल विषय-वस्तु से नये कौशल या विषयवस्तु को सोखने में बाधा पहुँचती है तो इसको ऋणात्मक या निषेधात्मक अंतरण कहा जाता है। उदाहरण के लिए एक टेनिस का खिलाडी जब क्रिकेट सीखता है तो उसे बाधा का सामना करना पड़ता है, यह ऋणात्मक अंतरण उदाहरण है। इसी  प्रकार कोई व्यक्ति भाषा सीखने में एक तरह की कठिनाई या बाधा का अनुभव करता है तो यह भी ऋणात्मक अंतरण का उदाहरण है। 
बोरिंग, लेंगफीस्य तथा वैल ने इस प्रकार से निषेधात्मक अंतरणों को स्पष्ट किया है "जब अधिगम किया गया एक कार्य दूसरे कार्य को सीखने में कठिनाई उत्पन्न करता है तो यह ऋणात्मक अंतरण कहलाता है।"
क्रो एवं क्रो ने घानत्मक्र तथा ऋणात्मक दोनों स्यानान्तरणों को व्यक्त करके  लिखा है "स्थानान्तरण की प्रक्रिया सकारात्मक हो सकती है जो अधिगम में सहायता है या निषेधात्मक हो सकती है जो परिवर्तित मानसिक क्रिया-कलाप की उपलब्धि में अन्तःकरण के रूप में उपस्थित होती है।

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