शून्य अंतरण

जब पहले सीखे गये कौशल का प्रभाव वर्तमान कौशल के सीखने पर न तो धनात्मक होता है और न ही ऋणात्मक, तो इसे शून्य अंतरण कहा जाता है। दूसरे शब्दों में कह सकते है जब एक क्षेत्र का ज्ञान दूसरे क्षेत्र के ज्ञान को न तो सहायता पहुँचाता है और न बाधा, तब हम उसे शून्य अंतरण कहते है।
अंतरण के कुछ विशिष्ट प्रकार-
मनोवैज्ञानिको ने अंतरण के कुछ विशिष्ट प्रकारों का भी वर्णन किया है जिनमें प्रमुख निम्नवत् है।
पार्श्वीय अंतरण- पार्श्वीय अंतरण एक ऐसा अंतरण है जिसमें सीखे गये कौशल का अंतरण एक ऐसी परिस्थिति या ऐसे विषय की अधिगम प्रक्रिया में निहित होता जो उसी स्तर का होता है। उदाहरण के लिए किसी छोटे बालक को सिखाया जाता है कि 9-3=6 है तो वह घर पर आकर 9 केलों में 3 केले ले लेने पर यह समझता है कि अब 6 केले ही शेष रहे होंगे, इस उदाहरण से हम पार्श्वीय अंतरण को भली प्रकार समझ सकते है।
द्विपार्श्वीय अंतरण- मनुष्य के शरीर के दो समान पार्श्वीय भाग बायाँ तथा दायाँ। जब शरीर के बाएं अंग से सीखे गये कौशल का अंतरण स्वतः दाएं अंग के सीखने पर या दाएँ अंग से सीखे गये कौशल का अंतरण बाएं से सीखने पर होता है तो उसे द्विपार्श्वीय उदाहरण कहते है। इसे क्रॉस शिक्षा भी कहते है। बालक अधिकार दाएँ हाथ से ही लिखते है यदि उन्हें बाएँ हाथ से लिखने के लिए कहा जाये तो ऐसा करने में वे समर्थ अवश्य होंगे, भले ही लिखने में समय अधिक तथा लिखावट की सुन्दरता अधिक न हो।
अनुलम्ब या लाबात्मक अंतरण- अनुलम्ब अंतरण जैसे अन्तर को कहा जाता है जिसमें सीखे गए का अंतरण उच्च स्तर के कौशल को सीखने में होता है। मन्नू ने इस तरह के अंतरण को सीढी पर ऊपर की ओर चढ़ने के समान की प्रक्रिया माना है।
अधिगम अंतरण के सिद्धांत 
अधिगम स्थानांतरण के निम्नलिखित मुख्य पॉच सिद्धान्त है

  1. औपचारिक अनुशासन का सिद्धान्त
  2. समतात्विक सिद्धान्त
  3. स्पीयरमैन का द्वितात्विक सिद्धान्त
  4. सामान्यीकरण का सिद्धान्त
  5. अवयववादी सिद्धान्त
  6. मूल्यों के अभिज्ञान का सिद्धान्त

औपचारिक अनुशासन- इस सिद्धान्त के अनुसार मस्तिष्क में विभिन्न प्रकार क्री शक्तियाँ होती है जैसे तांत्रिकी
विचार शक्ति, कल्पना शक्ति, स्मरण शक्ति, निर्णय शक्ति आदि। इन विभिन्न शक्तियां के प्रशिक्षण के माध्यम से अनुशासित किये जाने पर ही अभिगम का स्थानान्तरण सम्भव है। प्लेटो आदि विद्वानों ने तो इसी परिप्रेक्ष्य से मस्तिष्क एवं मन को अनुशासित करने के लिए गणित को एकमात्र साधन माना है। रोमन शिक्षाशास्त्रियों ने तो रेखागणित एवं ज्योमिती केसाधन को शासन हेतु अति प्रभावशाली साधन माना है। इस दृष्टि से स्तनांतरण की प्रक्रिया को बाकि प्रक्रिया से आगे माना है।
विद्यार्थी की विधिन्न शक्तियों के प्रक्षिक्षण से विभिन्न शक्तियों का निकाय होता हैअतः इन्हे स्वत्तन्त्र रूप से शक्तिशाली बनाना चाहिए। जिस प्रकार एक खिलाडी नियमित व्यायाम के द्वारा शरीर की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है वैसे ही निरन्तर अध्याय द्वारा ही मानसिक शक्तियों को विकसित किया जा सकता है। विद्यालयों में गणित व भौतिक विज्ञान जैसे विषय पढाये जाते है।
आलोचना- इस सिद्धान्त की आलोचना सर्वप्रथम जेम्स ने की। अधिगम के स्थानांतरण का यह सिद्धान्त काफी पुराना है तथा अब शक्तिशाली विज्ञान का अस्तित्व प्राय: अविश्वसनीय हो चुका है। मस्तिष्क एक इकाई है न कि अनेक शक्तियों का योगफल। थार्नडाइक्र, सारेन्सन आदि मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गये प्रयोगों का यही निष्कर्ष निकलता है कि किसी भी विषय को सीखे जाने के लिए किसी औपचारिक अनुशासन की आवश्यकता ही नहीं है।

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