सामाजिक समायोजन से सम्बन्धित समस्या

ज्यों-ज्यों बालक बड़ा होता जाता है, ज्यों-ज्यों भयों की संख्या और तीव्रता घटती जाती है। ज़रसिल्ड के अनुसार बालक का अपरिचित पर्यावणों व अनुभवों से जब भली भांति परिचित हो जाता तब उनके प्रति भय मिट जाता है।
उम्र के साथ-साथ डर तो घटते जाते है, लेकिन काल्पनिक, अलौकिक या दूरस्थ खतरों, अंधेरे व अंधेरे में रहने वाली काल्पनिक चीजों के तथा शव और मृत्यु से सम्बन्धित चीजों के डर बढ़ जाते है। हरलाक के अनुसार उत्तर बाल्यावस्था में बड़े बालक बदल जाने, उपहास का पात्र बनने या चिढाये जाने और हाथ में लिये काम में असफ़ल होने से भी डरते है। क्योंकि बड़ा बालक जानता है कि उसका भय प्रकट करने वाली परिस्थिति से वह बचने की केशिश करता है ताकि भयग्रस्त होने की हालत में दिखाई देने की अपमानजनक स्थिति में वह अपने आप को बचा सके। जरसिल्ड के अनुसार शर्म, जो कि सामाजिक परिस्थितियों में होने वाले भय का एक रूप है, प्राय: इस तरह के अधीरता सूचक व्यवहार में प्रकट होती है जैसे नाक कान या कपड़े को खींचते रहना, या कभी एक पाँव पर कमी दूसरे पाँव पर टिके रहना। विद्यालय में बालक गुह कार्य, परीक्षा पारिवारिक समस्याओं ,व्यक्तिगत और सामाजिक समायोजन से सम्बन्धित समस्याओं व स्वास्थ्य की समस्याओं से होती है। लड़कियां लडकों की अपेक्षा भयभीत रहती है।
  • सामाजिक- आर्थिक स्तर भी भय के प्रभावित करता है। निम्न सामाजिक स्तर के बालक अध्यापकों से अधिक मात्रा में प्रभावित होते है। उच्च सामाजिक स्तर के बालक महत्वाकांक्षा से प्रेरित होने के कारण कक्षा में अपनी स्थिति के प्रति उत्सुक व चिन्तित रहते है। मानसिक रूप से इस महत्वाकांक्षा को न पाने का भय उन्हें सताता रहता है।
  • जिज्ञासा-  जानने की इच्छा ही जिज्ञासा है। प्रत्येक नवीन वस्तु बालक की जिज्ञासा को उभारती है। बालक की जिज्ञासा उसका अपना शरीर, दूसरे व्यक्तियों का शरीर, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक यन्त्र होते है। बालक इनके बारे में प्रश्न पूछता है। पूर्व बाल्यावस्था में जिज्ञासा तीव्र होती है परन्तु उत्तर बात्यावस्था में जिज्ञासा प्रबल नहीं रहती। इस आयु में बालक अपनी जिज्ञासा को शान्त करने के लिए माता-पिता, अध्यापकों व सम्बन्धियों, बड़े बालकों से प्रश्न पूछता है। कई बार सन्तोषप्रद उत्तर न मिलने की स्थिति में वह अपनी जिज्ञासाओं के उत्तर वह स्वयं अध्ययन के द्वारा ढूंढने का प्रयास करता है। जरसिल्ड के अनुसार बालक की जिज्ञासु प्रवृत्ति का उसके बुद्धि के स्तर से सकारात्मक सम्बन्थ है। बालक के द्वारा किये गये प्रश्न आवश्यक नहीं कि जिज्ञासा के कारण ही है। कई बार इन प्रश्नों के पीछे भय, चिन्ता एवं बेचैनी अनुभव करते है। प्रत्येक बालक विभिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न तरीके से अपनी जिज्ञासा को प्रकट करता है। लड़के अपनी जिज्ञासाओं के लड़कियों की अपेक्षा खुलकर प्रर्दशित करते है। शायद इसके पीछे उन्हें दी जानी वाली स्वतन्त्रता है। तथापि जिज्ञासा में लिंग गत अन्तर नहीं पाये जाते।
  • हर्ष-  हर्ष को खुशी एवं प्रसन्नता का नाम है। हर्ष की अवस्था मनुष्य संतोष को महसूस करता है। हर्ष की अभिव्यक्ति को चेहरे पर देख कर पहचाना जा सकता है। मानसिक विकास के साथ-साथ हर्ष के तरीकों में अन्तर आने लगता है। जहॉ पहले बालक खिलौनों से आनन्द प्राप्त करता है। वहीं परिपक्वता के साथ वह असंगत परिस्थितियों पर प्रतिपक्षी के उल्लंघन से, असम्बद्धताओं को देखकर, हल्की विपक्षियों से, अप्रत्याशित आवाजों को सुनकर अथवा किसी ऐसी बात से जो परिस्थिति में अनुपयुक्त लगती है, उनका मुस्कुराना या हंसना आश्चर्यजनक होता है।

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