सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण

छात्रों की अधिगम प्रक्रिया पर उसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। सामान्यतः सांस्कृतिक वातावरण का आशय व्यक्ति द्वारा निर्मित या प्रभावित उन समस्त नियमों, विचारों, विश्वासों एवं भौतिक वस्तुओं की पूर्णता से है जो जीवन को चारों ओर से घेरे रहते हैं। इस प्रकार से संस्कृति बालक की सीखने की क्रिया पर एक अमिट छाप छोड़ती है तथा उसको अधिगम सुदृढ हेतु आधार प्रदान करती है। संस्कृति बालकों की आदतों, अनुशासन व अधिगम पर प्रभाव डालती है। सामाजिक वातावरण के अन्तर्गत समाज में प्रचलित रीति-रिवाज, मान्यताएं, आदर्श मूल्य एवं स्वयं व्यक्ति को समाज में स्थिति की जाती है जो उसके अधिगम को निश्चित तौर पर प्रभावित करती है। इसलिए व्यक्ति हर सामाजिक परिस्थिति में अनुकूलन बनाये रखता है।
सम्पूर्ण परिस्थिति- कक्षा-कक्ष में प्रभावी अधिगम की दृष्टि से यह अत्यन्त आवश्यक है कि बालक को एक ऐसी सम्पूर्ण परिस्थिति प्रदान की जाये जिसमें सीखने के समस्त तत्त्व व दशाएं विद्यमान हो। इसलिए विद्यालय का सम्पूर्ण वातावरण इस प्रकार से निर्मित किया जाय जो विद्यार्थी क्रो सम्पूर्ण सन्तुष्टि प्रदान को तथा उसकी शैक्षिक उपलब्धि स्तर को ऊपर उठाने के साथ-साथ उसके मनोबल को भी बनाये रखे। विद्यालय की सम्पूर्ण परिस्थिति कृत्रिम न लगकर स्वाभाविक होनी चाहिए। यदि सम्पूर्ण परिस्थिति सन्तोषप्रद है तो छात्रों की अधिगम प्रक्रिया सुगमता से सम्पादित होगी। अत: हम कह सकते है कि सीखने को प्रभावित करने वाले अनेक कारक, परिस्थितियों या तत्व होते है इनको नियत्रित करके ही सीखने में उन्नति की जा सकती है।
जैसा कि एमएल. विगो ने लिखा है- अधिगम क्षमता में वृद्धि से तात्पर्य ऐसी परिस्थितियों के निर्माण से है जिनमें निश्चित समय में बालक की क्रियाओं में अधिकतम परिवर्तन हो।
सौरेन्सन का मत है - "अधिगमकरता की आन्तरिक व बाह्य दशाएं उसके अधिगम को धनात्मक अथवा ऋणात्मक रूप से प्रभावित करती है।"
उपरोक्त कथनों से स्पष्ट होता है कि अधिगम की प्रभावक दशाओं या कारणों को दृष्टि में रखते हुए शिक्षक का यह दायित्व है कि वह इन कारकों को अधिगम के अनुकूल बनाये।
अधिगम अंतरण- सीखने की प्रक्रिया गतिशील प्रक्रिया होती है। एक परिस्थिति में सीखी गयी प्रक्रिया दूसरी परिस्थिति में सहायक होती है। इस प्रकार यह अधिगम प्रक्रिया जीवन पर्यन्त चलती रहती है।
अतः अंतरण एक महत्त्वपूर्ण संप्रत्यय है, जिस पर मनोवैज्ञानिकों ने बहुत से प्रयोग किये है। अधिगम अंतरण से तात्पर्य पहले सीखे गये कौशल का वर्तमान कौशल को सीखने पर पड़ने वाले प्रभाव से होता है। उदाहरण के तौर  पर यदि किसी व्यक्ति ने साइकिल चलानी सीख रखी है तो वह इस कौशल के ज्ञान से मोटर माइकिल चलाना भी आसानी से सीख जायेगा। इस प्रकार जब एक परिस्थिति में सीखा गया कार्य दूसरी परिस्थिति में कार्य सीखने में सहायक होता है तो इसे हम "सीखने में स्थानान्तरण" या "प्रशिक्षण का स्थानान्तरण" कहते है। अधिगम अंतरण में पाले सीखा गया कौशल बाद में सीखे जाने वाले कौशल पर प्रभाव डालता है।
अधिगम अंतरण की परिभाषा- अधिगम अंतरण शिक्षा मनोविज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। यदि यह कहा जाये कि शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत किये गये विभिन्न प्रयोगों में अधिगम अंतरण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में कहीं न कहीं विद्यमान रहा है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। अधिगम अंतरण विद्यालयों में "शिक्षा का प्रमुख आधार है।" यद्यपि बालक कक्षा में पृथक-पृथक विभिन्न विषय पढ़ता है किन्तु उनका उपयोग अपने विकास के लिए समग्र रूप से करता है। दूसरे शब्दों में हम यह भी अभिव्यक्त कर सकते है कि वह कक्षा-कक्ष में प्राप्त ज्ञान का उपयोग अपने भावी जीवन के निर्माण के लिए भी करता है। अधिगम अंतरण की परिभाषाएं विभिन्न मनोवैज्ञानिको ने अपने- अपने ढंग से प्रस्तुत की है।

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