व्यवहार वादी सिद्धांत

प्रार्थी के व्यवहार मे परिवर्तन से सम्बन्थित है इसलिए इसे सीखने का सिद्धांत कहा जाता है। सीखने का अर्थ आदतों या व्यवहार का सीखना या उनमें परिवर्तन लाना है। सीखना स्थाई होता है और अभ्यास पर आधारित होता है। सीखने में मनोवैज्ञानिक कारक जैसे रूचि क्षमता थकान आदि का कोई महत्व नहीं होता तो किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिये की जाने वाली नियमित किया है जो व्यक्ति की आदत या व्यवहार में स्थाई परिवर्तन लाती है। परन्तु यह आवश्यक है की व्यक्ति सीखने के लिए तत्पर होना चाहिए। व्यवहार वादी सिद्धान्त के कुछ प्रमुख नियम है-
  • आन्तरिक उमंग या अभिग्रहण जिसमे व्यक्ति प्रतिक्रियाएँ करता है।
  • संकेत या उतेजक जो प्रतिक्रिया के लिए बाध्य करता है।
  • प्रतिक्रिया - उत्तेजना प्रतिक्रिया करवाती है।
  1. पर्यावरणवाद : व्यक्ति का व्यवहार और स्वमेत्व उसके पर्यावरण के अनुसार रहता है, जहाँ यह रहता है, बडा होता है, अंतःक्रियाएं करता है उसका प्रभाव उस पर पड़ता है। वह आसपास के लोगों और भौगोलिक वातावरण से बहुत कुछ सीखता है। अन्य व्यक्ति अच्छे व्यवहार को पुरस्कृत करते हैं और बुरे व्यवहार को दंडित करते हैं व्यक्ति का व्यवहार दंड और पुरस्कार से व्यवस्थित होता है। अतएव परामर्श में व्यक्ति के पर्यावरण और उसके प्रारंभ की जानकारी आवश्यक होती है।
  2. प्रयोगवाद : व्यक्ति के व्यवहार परिवर्तन के लिए प्रयोग का माध्यम अपनाया जाता है। प्रयोगों द्वारा व्यक्ति के पर्यावरण और उसके निकट पहलू से व्यवहार प्रभावित होता है, का अध्ययन किया जाता है। यदि प्रयोग के द्वारा जानकारी प्राप्त होने पर पर्यावरण के विपरीत कारकों को रोक दिया जाये या उसमें परिवर्तन कर दिया जाये तो व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन हो सकता है।
  3. आशावाद : व्यक्ति के असामान्य व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए आशावादी दृष्टिकोण का होना आवश्यक है। परामर्शक पत्येक प्रार्थी के असामान्य व्यवहार में सुधार का आशावादी दृष्टिकोण अपनाता है। वातावरण की विस्तृत जानकारी और सामान्य प्रयोगों से उसके प्रभाव और अन्य हानिकारक कारणों का अध्ययन कर व्यवहार परिवर्तन की विधि अपनाता है। वह अपने कार्य में पूर्ण आश्वस्त होता है और पूर्ण सफलता की आशा करता है।
उपरोक्त तीन बिंदुओं के निष्कर्ष से कहा जा सकता है कि व्यक्ति के असामान्य व्यवहार या कुसमायोजन के प्रमुख  कारण विपरीत पर्यावरण की अनुभूति से सीखा गया व्यवहार और अप- अनुकूलित अर्जित पर्यावरण के प्रभावों को रोक दें अथवा परिवर्तित कर दें और को समायोजन सम्बन्धी आदतों और व्यवहार में सुधार कर दें तो व्यक्ति की कठिनाई दूर तो जाती है।
परामर्शक प्रार्थी को उसके भावी विचार धारणा आदि का अध्ययन  कर के प्रशिक्षण देता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि व्यव्हार आदत या संवेगात्मक दशा आदि व्यक्ति की समस्या का कारण हो सकती है अथवा किसी की प्रचलित धारणा प्रारम्भिक अनुभव आदि के कारण समस्या उत्पन्न हुई हो । कभी भी व्यक्ति की समस्या को छोटा नहीं समझना चाइए इसलिए परामर्शक समस्या के कारण को नियंत्रित करने का प्रयास ही नहीं करता बल्कि उसके व्यवहार मे सुधार लाने का भी प्रयास करता है जिससे यह समस्या के कारण से मुक्त हो जाप्ता है। फिर परामर्शक व्यक्ति की समस्या को प्रभावित करने वाले उत्तेजक को पहचान कर दूर करने या बदलने का प्रयास करता है। प्रार्थी को अपने असामान्थ व्यवहार को बदलने के लिए उत्तेजना के प्रभाव को कम किया जाता है। इसे नकारात्मक अभ्यास भी कहा जाता है।

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