बालक के द्वारा ईर्ष्या के भाव

बोसार्ड के अनुसार सहोदरों और माँ -बाप में बड़े बालक का प्राय: कोई 'प्रिय' होता है और प्रिय के लिये उसका परिवार के अन्य लोगों से जो 'प्रिय' नहीं है अधिक स्नेह होता है। गैस्रल के अनुसार जब कभी वह स्नेह प्रकट करता है, तब स्नेह अप्रत्याशित समूह में उजागर होता है।

  • ईर्ष्या - स्नेह के अभाव में बालक के द्वारा अभिव्यक्त की गई प्रतिक्रिया है । अपनी इच्छाओं की पूर्ति न हो पाने से अथवा मायनों के अभाव में ईर्ष्या का उदय होता है। ईर्ष्या एक मिश्रित संवेग है, जिसमें क्रोध एवं भय निहित रहता है। इसीलिये कहा गया है कि ईर्ष्या किसी व्यक्ति के अति क्रोधपूर्ण अहर्ष की भावना है। यह हमेशा सामाजिक परिस्थितियों में पैदा होती है, जिसमें बालक के चाहे लोग शामिल होते है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने आपको असुरक्षित महसूस करता है। जिस व्यक्ति से वह स्नेह की आशा करता है उसमें उसे भी स्नेह नजर आने लगता  है। बालक की ईर्ष्या उसके सहोदर एवं साथियों के द्वारा किये गये व्यवहार पर निर्भर करती है। ईर्ष्या की स्थिति से बालक अप्रसन्न-निराश व कुसमायोजित हो जाता है।

नये शिशु के पैदा होने पर अभिभावक नए शिशु की प्रसंसा करते है और ज्यादा प्यार करते है। अपने सहोदर के प्रति बालक ईर्ष्यालु हो जाता है, जब वह महसूस करता है कि उसे कम सुविधायें दी जा रही है। जरसिल्ड के अनुसार ज्यों-ज्यों बालक की रुचियों का दायरा विस्तृत होता जाता है, त्यों त्यों ईर्ष्या घटती जाती है। ईर्ष्या होने पर बालक अंगूठा चूसना, खाना न खाना व अन्य नकारात्मक व्यवहारों को अन्य व्यक्तियों का ध्यान अपनी ओर  आकर्षित करने के लिये करने लग जाते है। लड़कियां लडकों की अपेक्षा अधिक ईर्ष्यालु होती है।
जारिख व बोसार्ड के अनुसार बड़े परिवारों को अपेक्षा दो -तीन बच्चे वाले परिवारों में ईर्ष्या अधिक सामान्य होती है। जो मातायें बच्चों के लिये आवश्यकता से अधिक आकुल रहती है या जिनका अनुशासन एक तरफ़ा नहीं होता, उनके बच्चे में ईर्ष्या अधिक सामान्य और जो मातायें कम ध्यान देती है उनके बच्चों में कम होती है। बालकों में कम आयु का प्यार अधिक ईर्ष्या को जन्म देता है।
अध्यापकों द्वारा अपने भाइयों से तुलना किये जाने पर व अपने से अधिक लोकप्रिय साथी के प्रति ईर्ष्या की भावना पैदा हो जाती है। बालक, जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, वह अपने से उच्च आर्थिक स्तर के साथियों के प्रति ईर्ष्यालु हो जाता है। उत्तर बाल्यावस्था में बालक ईर्ष्या के भाव की उपेक्षा करके व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी करके या झूठ और बोल द्वारा परोक्ष तरीके से भी प्रकट करता है। बात्यावस्था ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है त्यों त्यों ईर्ष्या की अभिव्यक्ति के परोक्ष तरीके बढते जाते है और सीधे तरीके घटते जाते है। भय - छोटे बालकों की अपेक्षा बडे बालकों में भय कम पाया जाता है। छोटे बालक जानवरों, विभिन्न परिस्थितियों, अजनबियों से डरते है। जबकि बड़े बालक अंधेरे, जाग, बीमारी, डाक्टर, दुर्घटना, कुत्ते के काटने से डरते है। इससे यह पता चलता है कि बालको की शारीरिक व मानसिक अवस्था भय को उद्दीप्त करती है। बहुत से भय किसी अप्रिय अनुभव के अनुप्रभाव के रूप में पैदा होते है जैसे डाक्टर का भय।

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