संवेग के संदर्भ

निक्लिंट एवं हैहुर्मारेज के अनुसार कुछ  ऐसी चीजें है जो बालक में दूसरों से श्रेष्ठ होने की भावना पैदा करती हो जैसे व्यावहारिक मजाक, निषिद्ध वस्तुए खाना, सिगरेट का कश लेना या शराब चखना उसे बहुत ही आनन्द देती है। हर्ष की अभिव्यक्ति छोटे बालकों की अपेक्षा बडे बालक संयत रूप में करते है। छोटे बालक जहाँ हर्ष की अभिव्यक्ति उछल कर, तालियों बजाकर करते है। वहीं की बालक इस प्रकार का व्यवहार नहीं करते।
संवेगात्मक विकास में शिक्षक की भूमिका- प्रत्येक अध्यापक को निष्पक्ष व वस्तुनिष्ठ रूप में बालकों के संवेगों व भावनाओं को जानने का प्रयास करना चाहिये, अध्यापक को यह भी देखना चाहिये बालक के अभिव्यक्ती संवेग, अभिव्यक्ति व अन्तर्मन की भावनायें क्या है संवेगों को जानने के पश्च्यात अध्यापक की भूमिका दिशा-निदेश की है। संवेगों को समझने के पश्चात ही अध्यापक विद्यार्थियों के क्रोध रूपी संवेग का मार्गान्तीकरण का प्रतिस्पर्धा के रूप में विकसित करने में सहायता करता है। विद्यालय में बालक विभिन्न प्रकार के भय, ईंष्यों, जिज्ञासा व शत्रुतापूर्ण भावनायें लेकर जाता है। अध्यापक बालक के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करके उनके संवेगों को पुरष्कृत कर सकता है, विद्यार्थियों को क्रोध की उग्र अभिव्यक्ति से बचाने के लिये कारकों की तह में पहुँच कर समस्या का निदान करा सकता है। कई बार बलाक के आत्मसम्मान को जब बार-बार ठेस पहुँचती है, तो यह क्रोधित हो उठता है। अत: अध्यापक को बालकों के आत्म-सम्मान को ठेस न पहुंचे, संवेग व बालक के क्रोध को दबाने से भी बचाये व सामाजिक मानदपडों के ध्यान में रखते हुए अभिव्यक्ति को संवेगों को सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप ढालने  से जो समस्या होती है, उसे झेलने के लिए तैयार करना है। जिज्ञासा जैसे संवेग के संदर्भ में ध्यान देने योग्य बात है कि अध्यापक विद्यार्थियों के हर प्रश्नों के उत्तर दें क्योंकि यह आवश्यक नहीं कि प्रश्नों के उत्तर अभिभावकों के द्वारा दिया जाना सम्भव हो। जिज्ञासा को शान्त करने से बालको में प्रसन्नता, सजगता के साथ-साथ रुचियाँ भी विकसित होती है। यदि जिज्ञासा शान्त नहीं होती है तो बालक चिड़चिड़े व दब्बू स्वभाव के हो जाते है। अध्यापक जिज्ञासा को सन्तुष्ट करने के लिये स्रोतों को बताकर उसे स्वाध्यायी बनने की आदत विकसित कर सकता है। आज के सूचना औद्योगिकी युग में यह आवश्यक नहीं है कि ज्ञान है या नहीं। यह महत्त्वपूर्ण है कि ज्ञान को जैसे अर्जित किया जाये। जिज्ञासा बालकों को बौद्धिक क्षमताओं को उत्प्रेरित करती है तथा उसे सृजनात्मक व खोजी प्रकृति वाला बनाती है। भय के संवेग की स्थिति वातावरणीय है। बालक विद्यालयों परिस्थितियों से भी भयभीत होते है। परीक्षायें, परिणाम, स्वीकार्यता, अध्यापक, गुह कार्य, समवयस्क साथी से भी भयभीत होते है। इनसे भय होने की स्थिति में बालक का अधिगम प्रभावित होता है। वह अपनी स्वतन्त्र अभिव्यक्ति की क्षमता के साथ-साथ चिन्तन नहीं कर पाता। बहुत बार संकोच व भय के कारण, अपने अकेलेपन से जूझता रहता है। जिससे उसका शारीरिक व मानसिक विकास प्रभावित होता है। बालक को अध्यापक अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान कर, भय के कारणों को जाने व उन्हें दूर करने के लिये प्रयास करें। गृह कार्य को करने में अक्षम होने पर सहायता प्रदान करें, समवयस्क समूह के द्वारा टूयूटरिंग की व्यवस्था, खेल व पाट्य सहगामी क्रियाओं के द्वारा भयमुक्त बनाये। हर्षित होने की परिस्थितियों पैदा करें, ताकि बालक भय व तनाव से मुक्त हो सके। बालकों से प्रेमपूर्ण व्यवहार करें। बालकों को अनावश्यक रूप से दंडित, प्रताडित व दूसरों की उपस्थिति में निन्दा न करें। यदि बालक की असफलता को लेकर उसे दंडित या प्रताडित किया जा रहा है, तो यह स्थिति बालक को कुंठा निराशा, भयभीत बनती है। बालक एकाकी व तुच्छ होकर संवेगात्मक रूप से अस्वस्थ हो जाता है, इससे विद्यार्थी आक्रामक होते है अपराधी, भगौड़े व कुंठित व्यक्तित्व के स्वामी बन सकते है।

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