संवेगशीलता पर पर्यावरण का प्रभाव

प्रारम्भिक बाल्यावस्था में अलग-अलग बालकों में और एक ही बालक में अलग-अलग समयों में संवेगशीलता बहुत भिन्न होती है। संवेगशीलता पर पर्यावरण का प्रभाव देखने को मिलता है। यदि बालक ने शैशवावस्था में चिल्ला का व मचल का अपनी जिद की पूर्ति में प्रयोग किया है, तो वह बाल्यावस्था में भी अपने संवेगों को उग्र रूप में प्रर्दशित करता है। न केवल पर्यावरण बल्कि विद्यालय और परिवार में सहोदर स्थिति की भी संवेगात्मक विकास पर प्रभाव पड़ता है। लोच के अनुसार सौहार्द के साथ प्रतियोगिता में माता-पिता द्वारा लगाये अंकुश उसके बाधक होते है। दूसरे बालक को अपनी रक्षा के लिये माता- पिता से प्रोत्साहन मिलता है, जिससे उसे अपना क्रोध प्रकट करने और सीधा आक्रमण करने में कम संकोचित होता है। बालक पर संवेगात्मक दबाव तब अधिक होता है जब बालक का भाई/बहिन विपरीत लिंग का होता है, या दोनों के बीच आयु का अंतर इतना अधिक होता है कि माता -पिता दोनों की ओर एक समय में बराबर ध्यान नहीं दे पाते। माता-पिता यदि बालक से अधिक अपेक्षायें रखते है या आदर्शवादी है तो भी बालक की संवेगशीलता प्रभावित होती है।

  • क्रोध  - प्रारम्भिक बाल्यावस्था में क्रोध सबसे अधिक सामान्य संवेग होता है। बालक अपनी आवश्यकता की पुर्ति न होने पर पियंत्रण खो देता है दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए भी क्रोध का सहारा लेता है। क्रोध की अभिव्यक्ति उग्र रूप से करता है। हेदराम के अनुसार आयु बढने के साथ उग्रता कम होती जाती है। बालकों के खिलौनों का अन्य बालकों के द्वारा उपयोग करना, वयस्को का उसकी ओर ध्यान न देना, सामाजिक अस्वीकृति व असफलता की स्थिति बालक में क्रोध को जन्म देती है।

उत्तर बाल्यावस्था में भी इच्छापूर्ति में बाधा दूसरे बालकों से तुलना माता- पिता व शिक्षक द्वारा पक्षपात करने व अवहेलना करने तथा दूसरों की अधिक ध्यान देने पर बालक क्रोधित हो उठते है। माता- पिता व अध्यापकों द्वारा हर व्यवहार पर नसीहत भी क्रोध का एक कारण है। जहाँ बाल्यावस्था में क्रोध की अभिव्यक्ति जोर - जोर से रोकर, हाथ पैर पटककर, खिलौने तोड़ कर होती है वहीं उत्तर बाल्यावस्था बालक शब्दों के द्वारा अपने क्रोध की अभिव्यक्ति प्रदान करते है। उत्तर बाल्यावस्था में क्रोध की अभिव्यक्ति में उग्रता कम हो जाती है। क्रोध नामक संवेग का एक आयाम झुंझलाहट भी है। जब क्रोध को प्रकट नहीं कर पाते तो किसी का क्रोध किसी पर निकलता है, इसे ही क्रोध अन्तरण कहा जाता है। क्रोध की अभिव्यक्ति पर परिवार की सामाजिक- आर्थिक स्तर व संवेगों के प्रशिक्षण पर निर्भर करती है।

  • प्रेम - शैशवावस्था से ही प्रेम संवेग से परिचित हो जाता है। माता-पिता के साथ बालक प्रेम करता है क्योंकि उसे शारीरिक, मानसिक व सामाजिक सुरक्षा निकलती है। आयु के साथ -साथ प्रेम का दायरा विस्तृत होता जाता है। बालक इस अवस्था में माता-पिता के साथ अपने हम उम्र साथियों व विपरीत लिंग के लोगों के साथ प्रेम को महसूस करता है। मनुष्य में प्रेम करना व प्रेम बांटने की मूल प्रवृति होती है। प्रेम बालक व मनुष्य को इस बात की अनुभूति प्रदान करता है कि उसे समाज के अन्य सदस्य पसंद करते है। उत्तर बाल्यावस्था में बालक अपने किसी विशेष साथी के अति प्रेम की अभिव्यक्ति शारीरिक व शाब्दिक रूप में नहीं करता। वह अपने मित्रों के साथ सदैव रहने की इच्छा रखता है। अपने रहस्यों को अपने साथियों के साथ बांटता है। इस अवस्था में बालक अपने मित्रों को पत्र लिखते हैं व बारम्बार टेलीफोन करते है। बालक अपने समूह में उन मित्रों से स्नेह रखता है, जो उसके प्रति भी स्नेह रखते हों। बालक बड़े लोगों के द्वारा स्नेह प्रदर्शन को पसंद नहीं करते।

Comments

Popular posts from this blog

शून्य अंतरण

सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण

सामाजिक समायोजन से सम्बन्धित समस्या