पूर्व बाल्यावस्था

खेल - पूर्व बाल्यावस्था को प्राय: खिलौनों की आयु कहा जाता है। बालक खिलौनों के माध्यम से जानना प्राप्त करता है। बालक खिलौनों से बातें करता है। शेयर व क्लिर विटी के अनुसार खिलौने से बालक कितने समय तक खेलेगा और उसमें कितना रूचि लेगा, ये बाते आगे इस बात पर निर्भर करेंगी कि वह अकेला खेल रहा है या समूह में। जब खिलौने का चुनाव आयु और विकास के स्तर के अनुसार किया जाता है, तब बालक खेल के मुश्किल होने पर भी अधिक समय तक खेल में लीन रहता है।
बालक खेलते समय अपने खिलौनों है बातें करता है। अपने जीवन की घटनाओं के जैसा का जैसा खिलौनों के साथ दोहराता है। वस्तुओं का झूठ-मूठ प्रयोग करता है। अपने से बड़े लोगों की भूमिकाओं की नकल करता है, यथा गुडिया को सुलाना, दूध पिलाना। इस आयु में नाटकीय खेल की प्रधानता होती है। वास्तविक जीवन में देखि हुई चीजों की नकल बनाने सम्बन्धी रचनाओं में रुचि लेता है। परन्तु हूबहु नक़ल नहीं कर पाता। इसीलिये रेखाचित्रों में अनुपात सही नहीं आ पाते। जैल के अनुसार ऐसी स्थिति में परिपेक्ष्य, अनुपात, परिस्थिति को छोड़कर रंग भरने में अधिक समय लगाते है। उनके अधिकांश चित्र मकानों के गाडियों, पेडों और जानवरों के होते हैं। चार पाँच वर्ष की अवस्था में पडोस के बालकों से प्रतियोगिता वाले खेल खेलने लगता है। इस आयु के खेलों की प्रकृति सरल होती है व विभिन्नता भी नहीं होती। आपने अपने पास देखे होंगे कि बालक चोर सिपाही, औख-मिचोली, बिल्लो दुहा जैसे प्रतियोगिता वाले खेल खेलते दिखाई पड़ते है। इसी अवस्था में कौशल सम्बन्धित खेल भी बालकों में लोकप्रिय पाये गये है। प्रतियोगिता वाले खेलों में अकेले खेले जाने वाले व सामूहिक खेलों में बालको की भागीदारी देखने को मिलती है।
पूर्व व्याख्यानुसार विभिन्न प्रकार के खेलों के लिये तरह-तरह के खिलौने उपलब्ध है बालक बेबी मोटरकार और ट्राइसाइकिल चलाना, बालू और मिटटी उड़ना, उछलना, कूदना, वस्तुएँ फेकना आदि रोल पसन्द करता है। इस आयु में विभिन्न बाक्स की सहायता से तरह-तरह की आकृतियाँ बनाना पसन्द करता है। गली मैं खेलना भी पसंद करते हैं। 5 से 7 वर्ष की आयु में बालक संगीत, नृत्य, पशुओं और परियों की कहानियों सुनना पसन्द भी हैं।मानसिक और रचनात्मक क्रियायें बढ़ने से इस आयु मैं रचनात्मक और अनुकरणात्मक रोल खेले जाते हैं। इस प्रकार के कर्मो से बालक के मानसिक विकास में भी सहायता मिलती है। कहानी, कविता, अभिनय, संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि बालक में रचनात्मक और सांस्कृतिक विकास में सहायक होते हैं।
जीत प्राप्ति के लिये सभी एक-दूसरे के साथ सहयोग करते है। जीत प्राप्त होने पर सामूहिक रूप से खुशी को मनाते है सामूहिक खेलों से न केवल उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है, अपितु नेतृत्व सम्बन्धी गुणों का भी विकास होता है। लड़के नव-आगन्तुक को अपनी टोली का सदस्य बना लेते है व महत्वाकांक्षा व साहसिक कार्यों को करना सीखते है। लड़के व लड़कियों, कई बार समूह में झगडा करना भी सीख जाते है।
उत्तर बाल्यावस्था को खेल की आयु कहा जाता है। उत्तर बाल्यावस्था में सामूहिक खेलों में व्यक्तिगत खेलों की अपेक्षा रुचि अधिक होती है। लेहमैन और पीसी के अनुसार आनन्ददायक शारीरिक गतियों वाली क्रियाएँ, छिपने और खोजने की क्रियायें, वयस्क लोगों के अनुकरण की क्रियायें, कौशल प्रधान क्रियायें, रचनात्मक क्रियायें, ज्ञानेन्द्रियों की उत्तेजना पर आधारित सीख प्राप्ति की क्रियायें है रस्सी के खेल, संगीत और नृत्य के खेल, उत्तर बाल्यावस्था में बालकों में लोकप्रिय होते है।

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