अधिगम का प्रमुख सोपान

छात्र उस चीज को सिखने में तत्परता नहीं दिखाता है जो उसके लिए उपयोगी नहीं होती उसे सीखने में रुचि नहीं लेता क्योकि उदेश्य निर्धारण अधिगम का प्रमुख सोपान है और यह छात्र की अधिगम की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।
  • विषय-वस्तु की संरचना - विषयवस्तु की संरचना का अधिगम प्रक्रिया को सफल या अमल बनाने में बड़ा हाथ होता है । अत्त: विषयवस्तु की संरचना के सिद्धान्तो का पालन करके विषय-वस्तु का संगठन करना चाहिए। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विषय-वस्तु छात्रों के मानसिक स्तर के अनुरूप हो तथा तार्किक दृष्टि से कठिन से कठिन एवं सूक्ष्म प्रत्ययों को समझने के लिए चित्र, रेखाचित्र, ग्राफ, आंकड़े एवं उदाहरणों का यथास्थान प्रयोग किया जाना चाहिए। शिक्षक को समय समय पर विषय-वस्तु को पुनर्गठित भी करते रहना चाहिए।
  • विभिन्न विषयों का कठिनाई स्तर- विभिन्न विषयों का कठिनाई स्तर भी कक्षा-कक्ष में छात्रों के अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करता है। शिक्षक को विभिन्न विषयों के कठिनाई-स्तर क्रो दृष्टि में रखते हुए समय विभाग चक्र का निर्माण करना चाहिए। बालकों के अवधान पर रुचि को भी दृष्टि में रखना चाहिए क्योंकि हम व्यक्तिगत विभिन्न तथ्यों के संप्रत्यय से अवगत है। इसलिए एक छात्र की रुचि अंग्रेजी विषय में है, दूसरे की गणित में तथा तीसरा छात्र कला में रुचि लेता है। विषयों का कठिनाई-स्तर भी मूलत: एक-दूसरे में पर्याप्त भिन्न होता है। यदि एक विषय एक विद्यार्थी को सरल प्रतीत होता है तो दूसरा विषय उसको कठिन लगता है। अत: शिक्षक को यह मनोवैज्ञानिक तथ्य जान लेना चाहिए की छात्र एक समान नहीं होते उनमें विभिन्नता होती है, ध्यान में रखते हुए शिक्षण कार्य करना चाहिए तभी कक्षा-कक्ष में अधिगम प्रक्रिया सार्थक सिद्ध हो पाती है।
  • पूर्ण एवं अंश विधि- इस विधि की मुख्य विशेषता यह है कि इस विधि के आधार पर विद्यार्थी अपनी स्मरण शक्ति बढ़ा सकता है। सम्पुर्ण विधि के अन्तर्गत विद्यार्थी समस्त पाठ्य-वस्तु को एक साथ याद कर लेता है जब कि खण्ड विधि में समस्त पाठ्य-वस्तु को छोटे-छोटे अंशों में विभक्त करके एक-एक खण्ड याद किया जाता है, पूर्व विधि तथा अंश विधि दोनों ही अपने आप में लाभदायक है। परन्तु कुछ विशेष परिस्थिति में एक विधि दूसरी विधि से अधिक श्रेष्ठ हो जाती है। उदाहरणार्थ, जब कोई पाठ या विषय अधिक लम्बा नहीं है तथा उसमें तार्किकी क्रम आवश्यक है तो ऐसी परिस्थिति में विधि अंश विधि से अधिक लाभदायक है। परन्तु ज़ज़ कोई पाठ या विषय बहुत बड़ा है साथ ही कोई तार्किक क्रम नहीं है तो अंश विधि पुर्ण विधि से अधिक लाभदायक होगी। अंश विधि से सीखने में एक और लाभ यह भी है कि इसमें बालक की अभिरुचि तथा उत्साह बना रहता है।
  • अविराम तथा विराम विधि- अविराम विधि के अन्तर्गत सम्पूर्ण विषय-वस्तु को एक ही राग में बिना किसी अन्तराल या विश्राम के सिखा दिया जाता है जबकि विराम विधि में विषय वस्तु या पाठ को अन्तराल या विश्राम दे-देकर सिखाया जाता है। उदाहरणार्थ यदि कोई छात्र किसी कविता को एक घंटे तक लगातार पढकर याद करता है तो यह अविराम विधि का उदाहरण होगा लेकिन यदि वह प्रत्येक 20 मिनट के बाद पाँच मिनट का विश्राम करके उस कविता को याद करता है तो यह विराम विधि का उदाहरण होगा। मनोवैज्ञानिकों का सामान्य मत है कि कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर विराम विधि अविराम विधि से अधिक गुणकारी होती है क्योंकि अविराम विधि की तुलना में इनके यद् रखने की क्षमता अधिक होती है। विराम विधि सीखने में व्यक्ति की अभिरुचि बनी रहती है क्योंकि इससे बालक को थकान का अनुभव नहीं होता। अविराम विधि में ऐसा सम्भव नहीं है। विराम विधि में सीखा गया पाठ सामान्थत अधिक दिनों तक याद रहता है क्योंकि सीखे गए पाठ से मस्तिष्क में उत्पन्न स्मृति चिहों को सुदृढ़ होने का अवसर विश्राम की अवधि में मिल जाता है। विराम विधि से सीखते समय व्यक्ति में मानसिक नीरसता उत्पन्न नहां होती क्योंकि बीच-बीच में उसे विश्राम मिल जाता है।

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