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Showing posts from October, 2019

सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण

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छात्रों की अधिगम प्रक्रिया पर उसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। सामान्यतः सांस्कृतिक वातावरण का आशय व्यक्ति द्वारा निर्मित या प्रभावित उन समस्त नियमों, विचारों, विश्वासों एवं भौतिक वस्तुओं की पूर्णता से है जो जीवन को चारों ओर से घेरे रहते हैं। इस प्रकार से संस्कृति बालक की सीखने की क्रिया पर एक अमिट छाप छोड़ती है तथा उसको अधिगम सुदृढ हेतु आधार प्रदान करती है। संस्कृति बालकों की आदतों, अनुशासन व अधिगम पर प्रभाव डालती है। सामाजिक वातावरण के अन्तर्गत समाज में प्रचलित रीति-रिवाज, मान्यताएं, आदर्श मूल्य एवं स्वयं व्यक्ति को समाज में स्थिति की जाती है जो उसके अधिगम को निश्चित तौर पर प्रभावित करती है। इसलिए व्यक्ति हर सामाजिक परिस्थिति में अनुकूलन बनाये रखता है।
सम्पूर्ण परिस्थिति- कक्षा-कक्ष में प्रभावी अधिगम की दृष्टि से यह अत्यन्त आवश्यक है कि बालक को एक ऐसी सम्पूर्ण परिस्थिति प्रदान की जाये जिसमें सीखने के समस्त तत्त्व व दशाएं विद्यमान हो। इसलिए विद्यालय का सम्पूर्ण वातावरण इस प्रकार से निर्मित किया जाय जो विद्यार्थी क्रो सम्पूर्ण सन्तुष्टि प्रदान को तथा उसकी शैक्ष…

व्यवहार वादी सिद्धांत

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प्रार्थी के व्यवहार मे परिवर्तन से सम्बन्थित है इसलिए इसे सीखने का सिद्धांत कहा जाता है। सीखने का अर्थ आदतों या व्यवहार का सीखना या उनमें परिवर्तन लाना है। सीखना स्थाई होता है और अभ्यास पर आधारित होता है। सीखने में मनोवैज्ञानिक कारक जैसे रूचि क्षमता थकान आदि का कोई महत्व नहीं होता तो किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिये की जाने वाली नियमित किया है जो व्यक्ति की आदत या व्यवहार में स्थाई परिवर्तन लाती है। परन्तु यह आवश्यक है की व्यक्ति सीखने के लिए तत्पर होना चाहिए। व्यवहार वादी सिद्धान्त के कुछ प्रमुख नियम है-
आन्तरिक उमंग या अभिग्रहण जिसमे व्यक्ति प्रतिक्रियाएँ करता है।संकेत या उतेजक जो प्रतिक्रिया के लिए बाध्य करता है।प्रतिक्रिया - उत्तेजना प्रतिक्रिया करवाती है।पर्यावरणवाद : व्यक्ति का व्यवहार और स्वमेत्व उसके पर्यावरण के अनुसार रहता है, जहाँ यह रहता है, बडा होता है, अंतःक्रियाएं करता है उसका प्रभाव उस पर पड़ता है। वह आसपास के लोगों और भौगोलिक वातावरण से बहुत कुछ सीखता है। अन्य व्यक्ति अच्छे व्यवहार को पुरस्कृत करते हैं और बुरे व्यवहार को दंडित करते हैं व्यक्ति का व्यवहार दंड और पुरस्का…

बालक के द्वारा ईर्ष्या के भाव

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बोसार्ड के अनुसार सहोदरों और माँ -बाप में बड़े बालक का प्राय: कोई 'प्रिय' होता है और प्रिय के लिये उसका परिवार के अन्य लोगों से जो 'प्रिय' नहीं है अधिक स्नेह होता है। गैस्रल के अनुसार जब कभी वह स्नेह प्रकट करता है, तब स्नेह अप्रत्याशित समूह में उजागर होता है।

ईर्ष्या - स्नेह के अभाव में बालक के द्वारा अभिव्यक्त की गई प्रतिक्रिया है । अपनी इच्छाओं की पूर्ति न हो पाने से अथवा मायनों के अभाव में ईर्ष्या का उदय होता है। ईर्ष्या एक मिश्रित संवेग है, जिसमें क्रोध एवं भय निहित रहता है। इसीलिये कहा गया है कि ईर्ष्या किसी व्यक्ति के अति क्रोधपूर्ण अहर्ष की भावना है। यह हमेशा सामाजिक परिस्थितियों में पैदा होती है, जिसमें बालक के चाहे लोग शामिल होते है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने आपको असुरक्षित महसूस करता है। जिस व्यक्ति से वह स्नेह की आशा करता है उसमें उसे भी स्नेह नजर आने लगता  है। बालक की ईर्ष्या उसके सहोदर एवं साथियों के द्वारा किये गये व्यवहार पर निर्भर करती है। ईर्ष्या की स्थिति से बालक अप्रसन्न-निराश व कुसमायोजित हो जाता है।
नये शिशु के पैदा होने पर अभिभावक नए शिशु की प्रसंसा …

संवेग के संदर्भ

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निक्लिंट एवं हैहुर्मारेज के अनुसार कुछ  ऐसी चीजें है जो बालक में दूसरों से श्रेष्ठ होने की भावना पैदा करती हो जैसे व्यावहारिक मजाक, निषिद्ध वस्तुए खाना, सिगरेट का कश लेना या शराब चखना उसे बहुत ही आनन्द देती है। हर्ष की अभिव्यक्ति छोटे बालकों की अपेक्षा बडे बालक संयत रूप में करते है। छोटे बालक जहाँ हर्ष की अभिव्यक्ति उछल कर, तालियों बजाकर करते है। वहीं की बालक इस प्रकार का व्यवहार नहीं करते।
संवेगात्मक विकास में शिक्षक की भूमिका- प्रत्येक अध्यापक को निष्पक्ष व वस्तुनिष्ठ रूप में बालकों के संवेगों व भावनाओं को जानने का प्रयास करना चाहिये, अध्यापक को यह भी देखना चाहिये बालक के अभिव्यक्ती संवेग, अभिव्यक्ति व अन्तर्मन की भावनायें क्या है संवेगों को जानने के पश्च्यात अध्यापक की भूमिका दिशा-निदेश की है। संवेगों को समझने के पश्चात ही अध्यापक विद्यार्थियों के क्रोध रूपी संवेग का मार्गान्तीकरण का प्रतिस्पर्धा के रूप में विकसित करने में सहायता करता है। विद्यालय में बालक विभिन्न प्रकार के भय, ईंष्यों, जिज्ञासा व शत्रुतापूर्ण भावनायें लेकर जाता है। अध्यापक बालक के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करके …

संवेगशीलता पर पर्यावरण का प्रभाव

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प्रारम्भिक बाल्यावस्था में अलग-अलग बालकों में और एक ही बालक में अलग-अलग समयों में संवेगशीलता बहुत भिन्न होती है। संवेगशीलता पर पर्यावरण का प्रभाव देखने को मिलता है। यदि बालक ने शैशवावस्था में चिल्ला का व मचल का अपनी जिद की पूर्ति में प्रयोग किया है, तो वह बाल्यावस्था में भी अपने संवेगों को उग्र रूप में प्रर्दशित करता है। न केवल पर्यावरण बल्कि विद्यालय और परिवार में सहोदर स्थिति की भी संवेगात्मक विकास पर प्रभाव पड़ता है। लोच के अनुसार सौहार्द के साथ प्रतियोगिता में माता-पिता द्वारा लगाये अंकुश उसके बाधक होते है। दूसरे बालक को अपनी रक्षा के लिये माता- पिता से प्रोत्साहन मिलता है, जिससे उसे अपना क्रोध प्रकट करने और सीधा आक्रमण करने में कम संकोचित होता है। बालक पर संवेगात्मक दबाव तब अधिक होता है जब बालक का भाई/बहिन विपरीत लिंग का होता है, या दोनों के बीच आयु का अंतर इतना अधिक होता है कि माता -पिता दोनों की ओर एक समय में बराबर ध्यान नहीं दे पाते। माता-पिता यदि बालक से अधिक अपेक्षायें रखते है या आदर्शवादी है तो भी बालक की संवेगशीलता प्रभावित होती है।

क्रोध  - प्रारम्भिक बाल्यावस्था में क्रोध…

पूर्व बाल्यावस्था

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खेल - पूर्व बाल्यावस्था को प्राय: खिलौनों की आयु कहा जाता है। बालक खिलौनों के माध्यम से जानना प्राप्त करता है। बालक खिलौनों से बातें करता है। शेयर व क्लिर विटी के अनुसार खिलौने से बालक कितने समय तक खेलेगा और उसमें कितना रूचि लेगा, ये बाते आगे इस बात पर निर्भर करेंगी कि वह अकेला खेल रहा है या समूह में। जब खिलौने का चुनाव आयु और विकास के स्तर के अनुसार किया जाता है, तब बालक खेल के मुश्किल होने पर भी अधिक समय तक खेल में लीन रहता है।
बालक खेलते समय अपने खिलौनों है बातें करता है। अपने जीवन की घटनाओं के जैसा का जैसा खिलौनों के साथ दोहराता है। वस्तुओं का झूठ-मूठ प्रयोग करता है। अपने से बड़े लोगों की भूमिकाओं की नकल करता है, यथा गुडिया को सुलाना, दूध पिलाना। इस आयु में नाटकीय खेल की प्रधानता होती है। वास्तविक जीवन में देखि हुई चीजों की नकल बनाने सम्बन्धी रचनाओं में रुचि लेता है। परन्तु हूबहु नक़ल नहीं कर पाता। इसीलिये रेखाचित्रों में अनुपात सही नहीं आ पाते। जैल के अनुसार ऐसी स्थिति में परिपेक्ष्य, अनुपात, परिस्थिति को छोड़कर रंग भरने में अधिक समय लगाते है। उनके अधिकांश चित्र मकानों के गाडियों, …

सक्रिय तथा निश्चिय विधि

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विद्यार्थी पाठ्य वस्तु को दो विधियों से याद करता है। प्रथम सक्रिय विधि द्वितीय निक्रिय विधि। सक्रिय विधि के अन्तर्गत विद्यार्थी विषयवस्तु को जोर-जोर से या धीमे-धीमे बोल-बोल कर कंठस्थ करने का प्रयास करता है जबकि निक्रिय विधि के अन्तर्गत विद्यार्थी पाठ्य वस्तु को मन ही मन पढकर कंठस्थ करने का प्रयास करते है। गेट्स, एबिगहाप्त एवं उनके साथियों की दृष्टि से सक्रिय विधि, निक्रिय विधि की तुलना में कहीं अधिक उपयोगी है। किसी नवीन पाट्यवस्तु या नवीन विषय को सीखने में निक्रिय विधि, अक्रिय विधि की तुलना में कहीं अधिक श्रेष्ठ है। वैसे यह दोनों विधियाँ अपने आप में महत्वपूर्ण है और विद्यार्थी अपनी अभिवृत्ति के अनुरूप नवीन ज्ञान को सीखने में इनमें से किसी एक का चयन करता है।
वातावरण से संबन्धित कारक- बालक की अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले वातावरण से सम्बन्धित कुछ मुख्य कारक इस प्रकार से है-
वातावरण का प्रभाव- वंशानुक्रम से बालक केवल अपने पूर्वजों के गुणों को ही प्राप्त करता है लेकिन उन गुणों का समुचित विकास वातावरण द्वारा ही होता है। यदि वातावरण उचित नही है तो उसके गुणों का विकास भी ठीक प्रकार से …

अधिगम का प्रमुख सोपान

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छात्र उस चीज को सिखने में तत्परता नहीं दिखाता है जो उसके लिए उपयोगी नहीं होती उसे सीखने में रुचि नहीं लेता क्योकि उदेश्य निर्धारण अधिगम का प्रमुख सोपान है और यह छात्र की अधिगम की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।
विषय-वस्तु की संरचना - विषयवस्तु की संरचना का अधिगम प्रक्रिया को सफल या अमल बनाने में बड़ा हाथ होता है । अत्त: विषयवस्तु की संरचना के सिद्धान्तो का पालन करके विषय-वस्तु का संगठन करना चाहिए। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विषय-वस्तु छात्रों के मानसिक स्तर के अनुरूप हो तथा तार्किक दृष्टि से कठिन से कठिन एवं सूक्ष्म प्रत्ययों को समझने के लिए चित्र, रेखाचित्र, ग्राफ, आंकड़े एवं उदाहरणों का यथास्थान प्रयोग किया जाना चाहिए। शिक्षक को समय समय पर विषय-वस्तु को पुनर्गठित भी करते रहना चाहिए।विभिन्न विषयों का कठिनाई स्तर- विभिन्न विषयों का कठिनाई स्तर भी कक्षा-कक्ष में छात्रों के अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करता है। शिक्षक को विभिन्न विषयों के कठिनाई-स्तर क्रो दृष्टि में रखते हुए समय विभाग चक्र का निर्माण करना चाहिए। बालकों के अवधान पर रुचि को भी दृष्टि में रखना चाहिए क्योंकि हम व्यक्तिगत विभिन्न तथ…