अध्यापक व अधिगम प्रक्रिया

सिखने के सभी कारकों में अध्यापक की भूमिका प्रमुख है। अध्यापक का स्थान एक मार्ग दर्शक के रूप में माना जाता है। अधिगम में अध्यापक के व्यक्तित्व व शिक्षण प्रक्रिया दोनों का प्रभाव बालकों पर पड़ता है। अतः शिक्षक को अपने विषय का अच्छा ज्ञान होने के साथ ही उसे नवीनतम शिक्षण विधियों से भी अवगत होना चाहिए। उसका व्यक्तित्व, व्यवहार व चरित्र छात्रों के लिए अनुकरणीय होना चाहिए। छात्र शिक्षक के व्यवहार है बहुत-सी बातें स्वयं ही सीख लेते है।

  1. शिक्षण विधि- मनोवैज्ञानिको की धारणा है कि रुचिकर व मनोवैज्ञानिक शिक्षण विधि सीखने में सहायक होती है। शिक्षण की विधि जितनी अधिक वैज्ञानिक एवं प्रभावशाली होगी उतनी ही सीखने की प्रक्रिया सरल व लाभप्रद होगी। अतः शिक्षक को परोक्ष अवस्था में क्रीडा करके सीखना, क्रियात्मक कार्य तथा उच्च कक्षाओं में पुर्ण स्वत: क्रिया करना, सामूहिक विधि एवं अन्य विषयों से सहसम्बन्ध के माध्यम से अधिगम प्रक्रिया पुर्ण करनी चाहिए।
  2. दृश्य-श्नव्य सामग्री- अधिगम हेतु दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है। सीखने में ज्ञानेद्धियों का एवं मानसिक शक्तियों का प्रयोग तभी सफ़ल हो सकता है जब उनके संसाधन पर्याप्त हो। इसलिए प्रत्येक विषय के शिक्षण हेतु दृश्य-श्रव्य साममी का प्रयोग शिक्षक को करना चाहिए। विज्ञान के शिक्षण हेतु प्रतिमान, चार्ट-, व प्रयोगशालाओं में विविध उपकरणों को दिखाकर विषय वस्तु का अनुकरण करना चाहिए। इसी प्रकार से भाषा शिक्षण करते समय भाषायी कौशलों के विकास हेतु विभिन्न प्रकार की दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग करना चाहिए।
  3. सतत् अभ्यास- सतत् अभ्यास भी अधिगम का महत्त्वपूर्ण कारक है। शिक्षक सतत् अभ्यास के माध्यम से बालकों को अधिगम की जाने वाली विषयवस्तु का ज्ञान सरल व स्थायी बना सकता है, कठिन पाठ को अभ्यास के द्वारा सुगमता से सीखा जा सकता है। शिक्षक को शिक्षण किया का अभ्यास करवाते समय सही विधि एवं समय विवरण का भी ध्यान रखना चाहिए।
  4. उपचारात्मक शिक्षण - शिक्षक बालकों की दुर्बलताओं को दूर करके उपचारात्मक शिक्षण द्वारा बहुत कुछ सिखा सकता है। उपचारात्मक शिक्षण का मुख्य लक्ष्य है दोषों एवं दोषों के कारणों को खोज कर उनका निराकरण व दुरभ्यास को समाप्त करना। उपचारात्मक शिक्षण उन बालकों के लिए आवश्यक है जो भाषायी दोषों से ग्रस्त है।
  5. पुनर्बलन - अधिगम को प्रभावित करने वाले कारकों में पुनर्बलन एक महत्त्वपूर्ण कारक है। शिक्षक बालकों को यदि सही कार्य करने पर पुनर्बलन है तब बालक सीखने को तत्पर हो जायेगा। शिक्षक के द्वारा बालकों को पुनर्बलन देने से उनका मानसिक तनाव कम होगा, इससे छात्रों को सन्तोष भी प्राप्त होगा और उनके द्वारा सीखी गन्दी किया अधिक अस्थाई होगी।
  6. पाठन सहगामी क्रियायें- पाठन सहगामी क्रियायें भी अधिगम का एक महत्त्वपूर्ण कारक है। शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान के योगदान के रूप में आज पाट्यक्रम में अनेक महत्वपूर्ण सहगामी क्रियाओं क्रो यथोचित स्थान दिया जाता है। शिक्षक वाद-विवाद प्रतियोगिता, निबंध, लेख, कहानी, कविता, शैक्षणिक भ्रमण, अभिनय एवं नाटक आदि वित्भन्न क्रियाओं के माध्यम से बालकों को अधिगम के लिए अभिप्रेरित कर सकता है।
  7. भावना ग्रन्थियाँ- शिक्षक की भावना ग्रन्थियाँ भी कक्षा-कक्ष में छात्रों की अधिगम प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। जब शिक्षक में अहं उत्पन्न हो जाता है और अपने आपको सर्वश्रेष्ठ शिक्षक समझने लगता है। अहं भाव उत्पन्न होने के कारण अध्ययन नहीं करता और धीरे-धीरे शिक्षण कार्य में कुशलता कम होने लगती है। इसके विपरीत हीन भावना उत्पन्न होने पर भी अध्यापन कुशलता में कमी आने लगती है। इस प्रकार से दोनों प्रकार की भावना ग्रन्थियाँ छात्रों की अधिगम प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव डालती है।

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