बुद्धि का अधिगम से सीधा सम्बन्ध

जो विद्यार्थी जितना अधिक प्रखर बुद्धि का होगा,उसकी सीखने की क्षमता भी उतनी ही अधिक होगी। इस सम्बन्ध में अनेक शोध कार्य भी हुए है और उनका निष्कर्ष भी यही है कि बुद्धि एवं अधिगम का धनात्मक सम्बन्ध है। तीव्र बुद्धि बालक को अभिमेरणा की अत्यन्त आवश्यकता होती है।
अधिगम सक्रिया का बुद्धि एक सबसे महत्वपुर्ण घटक है।

  • रूचि - यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जो विषय वस्तु जितनी अधिक रुचिकर होगी शिक्षार्थी उसको उतना ही अधिक सीखने का प्रयास करेंगे। रुचि व अधिगम का भी सीखने की क्रिया में धनात्मक सम्बन्थ है। अध्यापक को चाहिए कि वे प्रत्येक विषय को ही नहीं अपितु प्रत्येक पाठ को रुचिकर बनाने का प्रयास करे। चित्र, मानचित्र, रेखाचित्र, लघुकथा, दृष्टान्त एवं उदाहरण आदि के शिक्षण प्रक्रिया में प्रयोग से पाठ को रुचिकर बनाया जा सकता है। रुचिकर विषय वस्तु को शिक्षार्थी सुगमता व शीघ्रता से सीखने का प्रयास करेंगे।
  • अभिवृत्ति- किसी विषय के प्रति सीखने वाले की अभिवृत्ति बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। यदि किसी विषय के प्रति छात्र की नकारात्मक अभिवृत्ति है तो शिक्षक चाहे कितना परिश्रम करे छात्र के सीखने की प्रवृति में उन्नति होने की सम्भावना नहीं होती है। इसके विपरीत यदि अध्यापक की किसी विषय के अति सकारात्मक अभिवृत्ति है तो वह सरलता है उस विषय की सिख जाता है।
  • अभिरुचि - अभिरुचि बालक की वह क्षमता है जिसके आधारपर हम उसकी भावी उपलब्धियों के विषय में पूर्व कथन करते है। यह वह शक्ति है जिसके आधार पर बालक का किसी कार्य विशेष की ओर झुकाव होता है, अत: अधिगम हेतु यह एक महत्त्वपूर्ण कारक है। किसी कार्य में सफलता प्राप्त करने हेतु अभिरुचि का होना बहुत जरूरी है। अभिरुचि किसी कार्य को सीखे जाने के लिए बालक पर अनुकूल प्रभाव डालती है। अत: अपनी रुचि के अनुसार जिस विद्यार्थी में जिन विषयों को पढ़ने की अभिरुचि हो उन्हें उन्हें विषयों का अध्ययन करना चाहिए।
  • थकान - सीखने की क्रिया को थकान भी प्रभावित करती है। थकान दो प्रकार की होती शारीरिक व मानसिक। थकान का अधिगम से सीधा सम्बन्थ है और थकान अधिगम पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। थकान शरीर को प्रभावित करती है है शरीर मन और अधिगम को। थकान से अधिगम क्रिया में रुचि उत्पन्न नहीं होती, अत: प्रत्येक कार्य को सीखने का समय परधारित करके ही सीखना चाहिए जिससे बालक कक्षा-कक्ष में थकान का अनुभव न करे।

शिक्षक से सम्बंधित कारक - अधिगम को प्रभावित करने वाले शिक्षक से सम्बन्धित कुछ कारक इस प्रकार है-

  1. विषय का ज्ञान - अध्यापक का किसी विषय से सम्बन्धित ज्ञान छात्रों की अधिगम प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते है। अध्यापक को यदि अपने शिक्षण विषय का पुर्ण ज्ञान है तो वह आत्मविश्वास के साथ छात्रों को नवीन ज्ञान देने में सक्षम होगा तथा उसका शिक्षण प्रभावी होगा। बालक अधिगम हेतु प्रेरित होंगे व शिक्षक द्वारा प्रदत्त ज्ञान को हृदयंगम करने में सक्षम होंगे।
  2. शिक्षक का व्यवहार - कक्षा-कक्ष में शिक्षक का व्यवहार छात्रों को सीखने के लिए प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। शिक्षक के व्यवहार में सहानुभूति, सहयोग, समानता, शिक्षण कला में निपुणता, मृदुभाषी आदि गुण हो तो छात्र कक्षा के शैक्षणिक वातावरण में सहजता से सब कुछ सीख लेंगे। लेकिन यदि शिक्षक का व्यवहार अत्यन्त कठोर है या वह छात्रों के साथ समान व्यवहार नहीं वरता है तो छात्र उसकी कक्षा से पलायन करने लगते है।
  3. मनोविज्ञान का ज्ञान - मनोविज्ञान का ज्ञान अध्यापक के लिए अनिवार्य है। जब तक अध्यापक को मनोविज्ञान के सिद्धान्तो का ज्ञान नहीं होता तब तक वह अपने शिक्षण को प्रभावी नहीं बना सकता क्योंकि मनोविज्ञान के सिद्धान्त जैसे- विकास के विभिन्न आयाम, व्यक्तिगत विभेद, अभिप्रेरणा, सीखने के नियम व सीखने के सिद्धान्तो के अनुप्रयोग से अपनी शिक्षण प्रक्रिया को लाभप्रद व बोधगम्य बना सकता है।

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