सीखने की क्रिया में सोपान

हम इस तथ्य से पूर्णत: अवगत है कि सीखना एक सतत्, व्यापक व जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। सीखने के लिए विभिन्न अनुभवों को एकत्रित करना पड़ता है और अनुभव अनेक क्रियाओं तथा उपक्रियाओं से निर्मित है।
मिलर तथा लेनार्ड ने सीखने की अक्रिया के प्रमुख सोपानों का वर्णन किया है। उन्होंने सीखने की प्रक्रिया का विश्लेषण किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि व्यक्ति किसी नवीन प्रक्रिया के अधिगम हेतु कई सोपन है उसका सामना बालक करता है। मिलर तथा लेनार्ड के "शब्दों" तथा "सीखने के लिए व्यक्ति को किसी वस्तु की आवश्यकता अनुभव होनी चाहिए उसे कुछ देखना चाहिए, उसे कुछ करना चाहिए और अन्त में उसे कुछ प्राप्त करना चाहिए।

  1. अभिप्रेरणा- जीवन में मानव का प्रत्येक कार्य जिसको वह करना चाहता है अभिप्रेरणा से संचालित होता है। व्यक्ति की बहुत सी आवश्यकताएं जिनकी पूर्ति नहीं हो पाती है वह सन्तुष्टि करने के लिए प्रयत्न करता है। इनकी पूर्ति के लिए उसमें प्रेरक उत्पन्न हो जाता है, तब व्यक्ति अत्यधिक क्रियाशील हो जाता है। वह तब तक सक्रिय रहता है जब तक कि उसकी आवश्यकता (लक्ष्य) की पूर्ति न हो जाये। अभिप्रेरणा ही उसे लक्ष्य की ओर ले जाती है तथा व्यक्ति उस प्रयोजन या लक्ष्य से प्रेरित होकर क्रिया करने को बाध्य हो जाता है। अत: कहा भी गया है कि अभिप्रेरणा अधिगम का राजमार्ग है।
  2. उद्देश्य- अधिगम लक्ष्य प्रेरित किया है। व्यक्ति का व्यवहार प्रयोजन से पुर्ण होता है। वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक निश्चित उद्देश्य की दिशा में व्यवहार करने लगता है। उद्देश्य निर्धारित हो जाने पर उसके व्यवहार की दिशा स्पष्ट व निश्चित हो जाती है। मानव उस क्रिया को सीखने के लिए तत्पर होता है जो उसकी आवश्यकता व उदेश्य की पूर्ति करती है।
  3. बाधा- व्यक्ति को उदेश्य की प्राप्ति करने के लिए बाधा उपस्थित न होने पर किसी नवीन अनुभव की प्राप्ति नहीं होती है। सीखने के मार्ग में बाघा के उपस्थित हो जाने पर व्यक्ति अनेक प्रकार के सम्भावित व्यवहार करता है। वह प्रयत्न व भूल, सूझ अथवा तर्क, अवबोध एवं ज्ञान आदि क्रिया के द्वारा उपर्युक्त व्यवहार को खोज निकलता है।
  4. विभिन्न संभावित अनुक्रियाएं- क्रिया के अधिगम हेतु जब मार्ग में बाघा उत्पन्न होती है तब मनुष्य पुर्ण परिस्थिति का अवलोकन करता है। वह बाधा का निराकरण करने हेतु अनेक प्रकार की सम्भावित क्रिया व प्रतिक्रिया करता है। वह बाधा को दूर करने के लिए तर्क, सूझ, प्रयास तथा त्रुटि आदि का भी सहारा लेता है।
  5. पुनर्बल- कोई अनुक्रिया आवश्यकता को पूर्ति में मनुष्य को क्षमता प्रदान करती है तो वह अनुक्रिया सुखद एवं सन्तोषजनक प्रतीत होती है साथ ही वह अनुक्रिया पुनर्वलित हो जाती है। व्यक्ति अन्य सभी असफल अनुक्रियाओं को भुला देता है तथा भविष्य में अनावश्यकता पड़ने पर वह अधिगम क्रिया हेतु सफल क्रिया की ही पुनरावृत्ति करता है जिसके द्वारा पूर्व में उसको सफलता की उपलब्धि हुई थी।
  6. संगठन- अधिगम उचित एवं सफ़ल अनुक्रियाओं का चुनाव एवं संगठन है, अधिगम की क्रिया विभिन्न अंगों का संगठन नवीन ज्ञान को पूर्व दान से छोड़ने के लिए किया जाता है। जब तक पूर्व दान एवं नवीन ज्ञान को जोड़ा नहीं जाता तब तक अधिगम क्रिया पूर्णता प्राप्त नहीं हो पाती।

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