खेल की आयु

जहाँ बालक स्कूल जाने से पहले अपने प्रिय खिलौनों से चिपका रहता है अब संगठित खेलों में भाग लेने लगता है। वहीं किशोरावस्था के लड़के- लड़कियों के संगठित खेलों में अक्रिय रूप से भाग लेता है। संभवतः इसीलिये उसे खेल की आयु कहा गया है। क्योकि छोटी आयु व किशोरावस्था के खेलों दोनों में उसकी रुचि दिखाई देती है, एक विरोधाभास देखने को मिलता है कि खेलने का समय विद्यालय जाने व ग्रह कार्य करने के करण काम हो जाता है और फिर भी इसे खेल की आयु कहा जाता है।
गेस्सेल के अनुसार इस आयु में लड़कियों सीना, पिरोना, रंगीन चित्र बनाना व आभूषण बनाना पसंद करती है। लड़के औजार की मदद से चीजे जनाना पसंद करते है। लेकिन बाल्यावस्था के बढने के साथ -साथ इनमें बालकों की रुचि कम हो जाती है। इस रुचि के कम होने के कारण अपनी रचनाओं की आलोचना व कभी कभी हीन भावना का शिकार होना है। उत्तर बाल्यावस्था की एक विशेषता बालकों का कपोल-कल्पित कहानियों में अरुचि
होना। परियों की कहानियों उसे आनन्दित नहीं करती। वह साहसपूर्ण घटनाओं की किताबे, ख्याति प्राप्त व्यक्तियों की खेलों के नायकों, अभिनेता व अभिनेत्रियों से सम्बन्धित पुस्तकें की और पूजा की प्रवृति के कारण पड़ना पसंद करते है। पुस्तकों को रुचि में लिंग सम्बन्धी व बौद्धिक अन्तर दिखाई देते है। जहाँ लड़कियों प्रकृति व सामाजिक विषय से सम्बन्धित पुस्तके पढ़ना पसन्द करती है, वहीं लड़के विज्ञान सम्बन्धी पुस्तकें पढना पसंद करते है।
स्पीक्लमैन् टरबिलिगर एवं प्रिज्योंग के अनुसार छोटे बालकों को रोचक लगने वाले क्रामिक्स में पशु-पात्र अधिक होते है और बड़े बालकों को पसंद जाने वाले कॉमिक्स में मानव प्रमुख भाग लेते है।
क्यर्दर्ध एवं थाम्पसनं के अनुसार लड़के इन कामिक्स की ओर आकर्षित होते है जिनका विषय, घटनाक्रम और क्रथा-प्रवाह प्रथक: पुरुषोचित होता है। जिनमें अपराध और हिंसा का वर्णन वहुत अधिक होता है या खेलकूद व
व्यायाम से सम्बन्धित्त होती है। जबकि लडकियाँ रबी प्रधान व क्रिशोऱीचित्त कामों के वर्णन वाले कामिक्स को अधिक पसंद करती हैं तथा जिनमें प्रणय और डेटिंग का उल्लेख होता है।
बालक कामिक्स पढकर अपने अप्रिय अनुभवों को भुलाने का प्रयास करते है। दैनिक जीवन की नीरसता से छुटकारा पाने के लिये मीतु वानिकी पड़ते है।
निम्नतम सामाजिक आर्थिक स्तर के बालक सिनेमा व टी.वी. देखना पसंद करते हैं। उच्च मध्यम वर्ग के बालक कम्पयूटर टी .वि. व सिनेमा देखने में समय व्यतीत करते है।
खेलों में लिंग सम्बन्धी अन्तर भी पाये जाते हैं। लड़के, लड़कियों की अपेक्षा कम साध्य रोल अधिक खेलते है। लिंग के अतिरिक्त बालक के बौद्धिक भार, उसके पड़ोस और उसको मिलने वाले खेलने के अवसरों का भी महत्व है।
सुलाना के अनुसार अधिकार बालको की खेल की सक्रियता बाल्यावस्था के बढने के साथ साथ घटती जाती है और सिनेमा ,रेडियो टेलीविजन तथा पढना इत्यादि मनोरंजन के साधन अधिक लोकप्रिय होते जाते है।
लड़कियों की रूचि घर में बेथ कर टीवी देखने की होती रहती है। जबकि लड़के बाहर जाकर खेलना अधिक पसंद करते है। इस उम्र में बालकों का ध्यान पढ़ाई की और खींचना बहुत जरूरी हो जाता है। उनको बताना चाहिए की उनको भविष्य में की करना है या क्या बनना है उसकी तैयारी अभी से ही करनी पड़ेगी। उनको उनके सपनो के बारे में पूछ कर उन्हें सच करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। जिससे बालक अपने भविष्य को लेकर सचेत रहे। अपने आस पास के सफल लोगों के उदाहरण देने चाइए जिनसे वो प्रेरित हो कर पढाई करे।

Comments

Popular posts from this blog

अधिगम- अंतरण का अर्थ

अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कारक

मूल्यों के अभिज्ञान का सिद्धान्त