संवेगात्मक विकास

बालक के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों का विकास ही उसके संतुलित विकास को पूर्णता प्रदान करता है। संवेगात्मक विकास जीवन के विविध चरणों से जुड़ा हुआ है। अत: संवेगों को व्यक्तित्व से पृथक से करके नहीं देखा जा सकता। अध्ययन की दृष्टि से व्यक्तित्व को इस आयाम को बाल्यावस्था के संदर्भ में समझना शिक्षकों के लिए आवश्यक है। संवेगात्मक विकास को समझने के लिए शब्द संवेगों को जानना अत्यधिक आवश्यक है। संवेग शब्द को उत्पत्ति लेटिन भाषा से हुई है जिसका अर्थ उत्तेजित दशा है। अर्थात् संवेग से तात्पर्य व्यक्ति की उत्तेजित दशा है। जब व्यक्ति उत्तेजित अवस्था में होता है, तो उस समय आन्तरिक व वाह्य व्यवहार दोनों में परिवर्तन हो जाता है। बुडवर्ध के अनुसार यह व्यक्ति की उत्तेजित दशा है। क्रिम्बाल यंग के अनुसार यह प्राणी की उत्तेजित मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दशा है जिसमे शारीरिक क्रियायें तेज और भावना प्रबल हो जाती है और इनमें एक निश्चित प्रकार का व्यवहार करने की प्रवृति रहती है। संवेग में भाव, आवेग तथा शारीरिकय एवं दैहिक प्रतिक्रिया, को सम्मिलित किया जाता है। भाव संवेग का अंग है जो मानसिक दशा से प्रभावित होता है।
बालक अपने संवेगों को व्यापक रूप से प्रकट करते है। एक क्षण बालक उदास दिखाई देता है तो दूसरे ही क्षण प्रसन्नचित्त नजर जाता है। हम सभी दूसरे व्यक्ति के भावों व संवेगों को उसके चेहरे को देख का पढ़ लेते है अर्थात् संवेगशीलता का अनुभव किया जा सकता है। यह हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करती है और चेहरे पर दिखलाई दे जाती है। बालक तो अपने संवेगों को छिपा नहीं पाते। चेहरे के भाव हमारी ह्रदय की भावनाओं की अभिव्यक्ति है। पूर्व बाल्यावस्था बढी हुई संवेगशीलता का समय होता है। जहाँ शैशवावस्था में भय, प्रेम व हर्ष संवेग की प्रधानता होती है, वहीं बाल्यावस्था में भय, ईर्ष्या का अनुचित रूप से उद्रेक विशेष रूप से होता है। बालक संवेगों को तीव्र रूप से अभिव्यक्त करता है। संवेगों को शारीरिक व वातावरणीय कारक प्रभावित करते है । बहुत अधिक खेलने से बालक थकावट के कारण अपने संवेगों को तीव्र रूप से व्यवत्त करता है। जब माता-पिता उसकी थकान की चिंता करके उसे सुनाने का प्रयास करते है या उसे भोजन के लिये आग्रह करते है तो बालक क्रोधित होकर व्यवहार करता है। उसमें नकारात्मक संवेग जन्म लेते है। संवेगों के विकास की गति उत्तर बाल्यावस्था में बालक के व्यक्तित्व के विकास का आधार बनती है। बाल्यावस्था में संवेग उत्तर बाल्यावस्था, युवावस्था व वयस्कावस्था से भिन्नता लिये हुए होते है। बाल्यावस्था में संवेग कुछ क्षणों के लिए प्रकट होते है। बालक अपने संवेगों को छिपाते या दबाते नहीं है। संवेगों की अभिव्यक्ति शारीरिक क्रियाओं के द्वारा करते है। धीरे- धीरे सामाजिक प्रतिमानों के अनुरूप संवेगों को अभिव्यक्त करना सिख जाते हैं। इसीलिये कहा जाता है कि जहाँ संवेगों में क्षणिकता दिखाई देती है वहीं प्रचंडता भी दृष्टिगोचर होती है। प्रचंडता का कारण उचित- अनुचित का ज्ञान न, होना व अपरिपक्वता को माना जा सकता है। संवेगों में परिवर्तन भी इस अवस्था की एक अन्य विशेषता है। बालकों के संवेगों में एकदम से न केवल परिवर्तन होता है बल्कि बिना किसी संकोच के उनको प्रकट करते है। संवेगों को प्रकट करते समय अपने आस -पास के वातावरण पर कभी तो ध्यान नहीं देते और कभी -कभी एकदम अपना ध्यान दूसरी ओर कर लेते है। बात्यावस्था के आरम्भ में संवेगों की के तीव्र प्रकटीकरण में प्रबलता पाई जाती है, तो धीरे -धीरे प्रकटीकरण में सामाजिक स्वीकृति के मद्देनज़र रखते हुए प्रबलता में कमी पायी जाती है।

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