प्रार्थी केंद्रित परामर्श

यह विधि प्रारम्भ में अनिर्देशित परामर्श कहलाती थी। बाद में केंद्रित विधि कहलाने लगी। यह व्यक्ति के आंतरिक मन के सिद्धान्त से सहमत नहीं है। व्यक्ति एक यंत्र है इसकी पूर्व निर्धारित धरणा को बदलना जा सकता हैं। फ्राहडिवन की विचारधारा है की व्यक्ति अविवेकी है अचेत्तनावस्था से नियन्वित होता हैं अर्थात् व्यक्ति के व्यवहार के लिए उसकी जीवन में व्याप्त अनुभव और स्मरण उत्तरदायी है। वे मनुष्य को एक अस्तित्त्ववादी प्राणी मानते है और यह अपने भौतिक संसार में विवेक और स्मरण से प्रगतिशील है। उसमे अपनी प्रगति और इच्छाओं की पूर्ति का गुण है और अपनी समस्याओं को सुलझाने की योग्यता है। वह एक सम्पूर्ण व्यक्ति है। वह ऐसा प्राणी है जो व्यावहारिक जीवन मे अपनी जरूरतों की पूर्ति में क्रियाशील रहता हैं। वह व्यक्ति है मन और उन्नति की भावना रखता है वह प्रेरित होता रहता है और बाद में भौतिक जगत के हिसाब से अपने आप को ढालता है।
कार्ल रोजर्स के अनुसार प्रार्थी केंद्रित परामर्श का उद्देश्य परामर्श साक्षात्कार प्रार्थी की व्यक्तिगत क्षमताओं और प्रतिभाओं को स्वयं विकास और स्वयं के विकास को पहचानने में लगाना है । परामर्शक प्रार्थी की इस प्रकार सहायता करता है जिससे वह स्वयं विकसित हो करके अपनी समस्याएं स्वयं हल करे और पूर्ण रूप से विश्वास  से संपूर्ण जीवन जी सके। परामर्श का उद्देश्य व्यक्ति के अन्तरमन में पूर्ण परिवर्तन लाना है। इस सिद्धान्त की प्रक्रिया में स्वयं एक अनुभव है एक सम्बन्ध है, एक जाति है जो जीवन का सार है इसका अर्थ स्थापन है जो जीवन को पूर्णता दिलाता है। परामर्शक प्रार्थी को यह अनुभव करता है कि वह स्वयं प्रमुख पात्र है जो परामर्शक के सहयोग से बोलता है, आनंद लेता है, ओर अपनी इच्छानुसार क्रियाएं करता है। परामर्शक प्रार्थी को सामाजिक स्वीकृति की आवश्यकता पर अधिक बल देता है। इसके लिए प्रार्थी के लिए  सुखद और स्वीकृतिपूर्ण वातावरण का निर्माण किया जाता है। परामर्श द्वारा प्रार्थी का स्वयं के प्रति दृष्टिकोण सुझाया जात्ता है अर्थात् स्व में सुधार लाना और अपनी कठिनाइयों को खुद ढूंढना, उन्हें स्वीकार करना और उन्हें दूर करने के लिए दृढ प्रतिज्ञ होना।
प्रार्थी केंद्रित परामर्श में परामर्शक की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है वह निरन्तर अपने परामर्श द्वारा प्रार्थी को यह अहसास कराता रहता हैं कि उसका परामर्श सार्थक है और उसके विचार और राय निरर्थक नहीं है। रोजर्स के अनुसार वह "अनुरूपता" पुनः प्रस्थापना की तलाशा करता है। परामर्शक की भूमिका एक प्रकार से अनुभव  सुनने वाले की हैं न की अधिकार जताने वाले की। वह प्रार्थी की हर एक बाल में रुचि दर्शाता है। कभी भी अपना निर्णय नहीं देता । यह सिर्फ प्रार्थी द्वारा कही बातों को सीधे सरल और सारगर्भित "शब्दों" में दोहरा देता है। यह प्रार्थी द्वारा बनाई बातों को स्वीकार या स्वीकार नहीं करता परन्तु कुछ बातों को बारीकी से जानने का प्रयास अवश्य करता है। वह प्रार्थी द्वारा कही गई बातों को प्रत्यक्ष सूचना के आधार पर सुनता हैं। प्रार्थी केंद्रित परामर्श प्रक्रिया मे परामर्शक और प्रार्थी का पारस्परिक सम्बन्ध सर्वश्रेष्ट होते है और उसका महत्व और प्रभाव भी बहुत अधिक होता है। परामर्शक प्रार्थी के प्रति अछि भावना स्नेह मौर सहानुभूति प्रकट करता है। वह पूर्वाग्रह अथवा पूर्व धारणा से मुक्त होता है वह प्रार्थी के प्रति समर्पित हो कर उसकी बातों का विश्लेषण करता है।

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