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Showing posts from September, 2019

पाठ्यवस्तु से सम्बंधित कारक

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अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले पाट्यवस्तु से सम्बंधित कुछ मुख्य कारक इस प्रकार है-
विषय-वस्तु की प्रकृति - विषय-वस्तु की प्रवृति अधिगम-प्रक्रिया को पुर्ण रूप से प्रभावित करती है। यदि विषयवस्तु सरल हो तो सामान्य छात्र भी उसका मतलब सीख लेते है। यदि विषय-वस्तु कठिन है तो छात्रों के सीखने में कठिनाई का अनुभव होता है। साथ ही कठिन विषय-वस्तु को याद करने में भी अधिक समय लगता है, इसके अतिरिक्त गद्य, पद्य, गणित एवं विज्ञान की प्रकृति भिन्न होने के कारण भी अधिगम प्रक्रिया प्रभावी होती है। विषय-वस्तु का चयन बालकों के मानसिक स्तर के अनुरूप करना चाहिए।विषय-वस्तु का आकार-  विषय-वस्तु का आकार व मानक भी दृश्यों की अधिगम प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है । छात्र उन पाठों का अध्ययन पहले करते है जो छोटे होते है तथा विषयवस्तु कम होती है । वह लम्बे-लम्बे पाठों से बचना चाहता है। यदि विषय-वस्तु का आकार विस्तृत है तो बालक उन पाठों की तैयारी मन लगा कर नहीं करता तथा विस्तृत विषय-वस्तु से वह शीघ्र थक जाता है और नीरसता का अनुभव करता है।विषय-वस्तु का क्रम - प्रत्येक्र विषय-वस्तु का कठिनाई स्तर …

अध्यापक व अधिगम प्रक्रिया

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सिखने के सभी कारकों में अध्यापक की भूमिका प्रमुख है। अध्यापक का स्थान एक मार्ग दर्शक के रूप में माना जाता है। अधिगम में अध्यापक के व्यक्तित्व व शिक्षण प्रक्रिया दोनों का प्रभाव बालकों पर पड़ता है। अतः शिक्षक को अपने विषय का अच्छा ज्ञान होने के साथ ही उसे नवीनतम शिक्षण विधियों से भी अवगत होना चाहिए। उसका व्यक्तित्व, व्यवहार व चरित्र छात्रों के लिए अनुकरणीय होना चाहिए। छात्र शिक्षक के व्यवहार है बहुत-सी बातें स्वयं ही सीख लेते है।

शिक्षण विधि- मनोवैज्ञानिको की धारणा है कि रुचिकर व मनोवैज्ञानिक शिक्षण विधि सीखने में सहायक होती है। शिक्षण की विधि जितनी अधिक वैज्ञानिक एवं प्रभावशाली होगी उतनी ही सीखने की प्रक्रिया सरल व लाभप्रद होगी। अतः शिक्षक को परोक्ष अवस्था में क्रीडा करके सीखना, क्रियात्मक कार्य तथा उच्च कक्षाओं में पुर्ण स्वत: क्रिया करना, सामूहिक विधि एवं अन्य विषयों से सहसम्बन्ध के माध्यम से अधिगम प्रक्रिया पुर्ण करनी चाहिए।दृश्य-श्नव्य सामग्री- अधिगम हेतु दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है। सीखने में ज्ञानेद्धियों का एवं मानसिक शक्तियों का प्रयोग तभी सफ़ल हो सकता है जब…

बुद्धि का अधिगम से सीधा सम्बन्ध

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जो विद्यार्थी जितना अधिक प्रखर बुद्धि का होगा,उसकी सीखने की क्षमता भी उतनी ही अधिक होगी। इस सम्बन्ध में अनेक शोध कार्य भी हुए है और उनका निष्कर्ष भी यही है कि बुद्धि एवं अधिगम का धनात्मक सम्बन्ध है। तीव्र बुद्धि बालक को अभिमेरणा की अत्यन्त आवश्यकता होती है।
अधिगम सक्रिया का बुद्धि एक सबसे महत्वपुर्ण घटक है।

रूचि - यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जो विषय वस्तु जितनी अधिक रुचिकर होगी शिक्षार्थी उसको उतना ही अधिक सीखने का प्रयास करेंगे। रुचि व अधिगम का भी सीखने की क्रिया में धनात्मक सम्बन्थ है। अध्यापक को चाहिए कि वे प्रत्येक विषय को ही नहीं अपितु प्रत्येक पाठ को रुचिकर बनाने का प्रयास करे। चित्र, मानचित्र, रेखाचित्र, लघुकथा, दृष्टान्त एवं उदाहरण आदि के शिक्षण प्रक्रिया में प्रयोग से पाठ को रुचिकर बनाया जा सकता है। रुचिकर विषय वस्तु को शिक्षार्थी सुगमता व शीघ्रता से सीखने का प्रयास करेंगे।अभिवृत्ति- किसी विषय के प्रति सीखने वाले की अभिवृत्ति बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। यदि किसी विषय के प्रति छात्र की नकारात्मक अभिवृत्ति है तो शिक्षक चाहे कितना परिश्रम करे छात्र के सीखने की प्रवृति में उन्नत…

सीखने की क्रिया में सोपान

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हम इस तथ्य से पूर्णत: अवगत है कि सीखना एक सतत्, व्यापक व जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। सीखने के लिए विभिन्न अनुभवों को एकत्रित करना पड़ता है और अनुभव अनेक क्रियाओं तथा उपक्रियाओं से निर्मित है।
मिलर तथा लेनार्ड ने सीखने की अक्रिया के प्रमुख सोपानों का वर्णन किया है। उन्होंने सीखने की प्रक्रिया का विश्लेषण किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि व्यक्ति किसी नवीन प्रक्रिया के अधिगम हेतु कई सोपन है उसका सामना बालक करता है। मिलर तथा लेनार्ड के "शब्दों" तथा "सीखने के लिए व्यक्ति को किसी वस्तु की आवश्यकता अनुभव होनी चाहिए उसे कुछ देखना चाहिए, उसे कुछ करना चाहिए और अन्त में उसे कुछ प्राप्त करना चाहिए।

अभिप्रेरणा- जीवन में मानव का प्रत्येक कार्य जिसको वह करना चाहता है अभिप्रेरणा से संचालित होता है। व्यक्ति की बहुत सी आवश्यकताएं जिनकी पूर्ति नहीं हो पाती है वह सन्तुष्टि करने के लिए प्रयत्न करता है। इनकी पूर्ति के लिए उसमें प्रेरक उत्पन्न हो जाता है, तब व्यक्ति अत्यधिक क्रियाशील हो जाता है। वह तब तक सक्रिय रहता है जब तक कि उसकी आवश्यकता (लक्ष्य) की पूर्ति न हो जाये। अभिप्रेरणा ही उ…

खेल की आयु

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जहाँ बालक स्कूल जाने से पहले अपने प्रिय खिलौनों से चिपका रहता है अब संगठित खेलों में भाग लेने लगता है। वहीं किशोरावस्था के लड़के- लड़कियों के संगठित खेलों में अक्रिय रूप से भाग लेता है। संभवतः इसीलिये उसे खेल की आयु कहा गया है। क्योकि छोटी आयु व किशोरावस्था के खेलों दोनों में उसकी रुचि दिखाई देती है, एक विरोधाभास देखने को मिलता है कि खेलने का समय विद्यालय जाने व ग्रह कार्य करने के करण काम हो जाता है और फिर भी इसे खेल की आयु कहा जाता है।
गेस्सेल के अनुसार इस आयु में लड़कियों सीना, पिरोना, रंगीन चित्र बनाना व आभूषण बनाना पसंद करती है। लड़के औजार की मदद से चीजे जनाना पसंद करते है। लेकिन बाल्यावस्था के बढने के साथ -साथ इनमें बालकों की रुचि कम हो जाती है। इस रुचि के कम होने के कारण अपनी रचनाओं की आलोचना व कभी कभी हीन भावना का शिकार होना है। उत्तर बाल्यावस्था की एक विशेषता बालकों का कपोल-कल्पित कहानियों में अरुचि
होना। परियों की कहानियों उसे आनन्दित नहीं करती। वह साहसपूर्ण घटनाओं की किताबे, ख्याति प्राप्त व्यक्तियों की खेलों के नायकों, अभिनेता व अभिनेत्रियों से सम्बन्धित पुस्तकें की और पूजा की…

प्रार्थी केंद्रित परामर्श

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यह विधि प्रारम्भ में अनिर्देशित परामर्श कहलाती थी। बाद में केंद्रित विधि कहलाने लगी। यह व्यक्ति के आंतरिक मन के सिद्धान्त से सहमत नहीं है। व्यक्ति एक यंत्र है इसकी पूर्व निर्धारित धरणा को बदलना जा सकता हैं। फ्राहडिवन की विचारधारा है की व्यक्ति अविवेकी है अचेत्तनावस्था से नियन्वित होता हैं अर्थात् व्यक्ति के व्यवहार के लिए उसकी जीवन में व्याप्त अनुभव और स्मरण उत्तरदायी है। वे मनुष्य को एक अस्तित्त्ववादी प्राणी मानते है और यह अपने भौतिक संसार में विवेक और स्मरण से प्रगतिशील है। उसमे अपनी प्रगति और इच्छाओं की पूर्ति का गुण है और अपनी समस्याओं को सुलझाने की योग्यता है। वह एक सम्पूर्ण व्यक्ति है। वह ऐसा प्राणी है जो व्यावहारिक जीवन मे अपनी जरूरतों की पूर्ति में क्रियाशील रहता हैं। वह व्यक्ति है मन और उन्नति की भावना रखता है वह प्रेरित होता रहता है और बाद में भौतिक जगत के हिसाब से अपने आप को ढालता है।
कार्ल रोजर्स के अनुसार प्रार्थी केंद्रित परामर्श का उद्देश्य परामर्श साक्षात्कार प्रार्थी की व्यक्तिगत क्षमताओं और प्रतिभाओं को स्वयं विकास और स्वयं के विकास को पहचानने में लगाना है । परामर्शक…

संवेगात्मक विकास

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बालक के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों का विकास ही उसके संतुलित विकास को पूर्णता प्रदान करता है। संवेगात्मक विकास जीवन के विविध चरणों से जुड़ा हुआ है। अत: संवेगों को व्यक्तित्व से पृथक से करके नहीं देखा जा सकता। अध्ययन की दृष्टि से व्यक्तित्व को इस आयाम को बाल्यावस्था के संदर्भ में समझना शिक्षकों के लिए आवश्यक है। संवेगात्मक विकास को समझने के लिए शब्द संवेगों को जानना अत्यधिक आवश्यक है। संवेग शब्द को उत्पत्ति लेटिन भाषा से हुई है जिसका अर्थ उत्तेजित दशा है। अर्थात् संवेग से तात्पर्य व्यक्ति की उत्तेजित दशा है। जब व्यक्ति उत्तेजित अवस्था में होता है, तो उस समय आन्तरिक व वाह्य व्यवहार दोनों में परिवर्तन हो जाता है। बुडवर्ध के अनुसार यह व्यक्ति की उत्तेजित दशा है। क्रिम्बाल यंग के अनुसार यह प्राणी की उत्तेजित मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दशा है जिसमे शारीरिक क्रियायें तेज और भावना प्रबल हो जाती है और इनमें एक निश्चित प्रकार का व्यवहार करने की प्रवृति रहती है। संवेग में भाव, आवेग तथा शारीरिकय एवं दैहिक प्रतिक्रिया, को सम्मिलित किया जाता है। भाव संवेग का अंग है जो मानसिक दशा से प्रभावित होता है।